श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ३ ]
परिशिष्ट भाव —परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें कामना ही खास बाधक है। जैसे, पानीसे भरा हुआ घड़ा है और उसमें हमें दो काम करने हैं—उसको खाली करना है और उसमें आकाश भरना है। परन्तु वास्तवमें हमें दो काम नहीं करने हैं, प्रत्युत एक ही काम करना है—घड़ेको खाली करना। घड़ेमेंसे पानी निकाल दें तो आकाश अपने-आप भर जायगा। ऐसे ही कामनाका त्याग करना और परमात्माको प्राप्त करना—ये दो काम नहीं हैं। कामनाका त्याग कर दें तो परमात्माकी प्राप्ति अपने-आप हो जायगी। केवल कामनाके कारण ही परमात्मा अप्राप्त दीख रहे हैं।
आवृत्तं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३१ ॥
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | होनेवाले | नित्यवैरिणा | = नित्य वैरिके द्वारा |
|---|---|---|---|---|
| एतेन | = इस | च | = और | ज्ञानम् |
| अनलेन | = अग्निके (समान) | ज्ञानिनः | = विवेकियोंके | विवेक |
| दुष्पूरेण | = (कभी) तृप्त न | कामरूपेण | = कामना-रूप | आवृत्तम् |
व्याख्या —‘एतेन’—सँतीसवें श्लोकमें भगवान्ने पाप करवानमें मुख्य कारण ‘काम’ अर्थात् कामनाको बताया था। उसी कामनाके लिये यहाँ ‘एतेन’ पद आया है।
‘दुष्पूरेणानलेन च’ —जैसे अग्निमें धीकी सुहाती-सुहाती (अनुकूल) आहुति देते रहनेसे अग्नि कभी तृप्त नहीं होती, प्रत्युत बढ़ती ही रहती है, ऐसे ही कामनाके अनुकूल भोग भोगते रहनेसे कामना कभी तृप्त नहीं होती, प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती ही रहती है*। जो भी वस्तु सामने आती रहती है, कामना अग्निकी तरह उसे खाती रहती है।
भोग और संग्रहकी कामना कभी पूरी होती ही नहीं। जितने ही भोग-पदार्थ मिलते हैं, उतनी ही उनकी भूख बढ़ती है। कारण कि कामना जड़की ही होती है, इसलिये जड़के सम्बन्धसे वह कभी मिटती नहीं, प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती है। सुन्दरदासजी लिखते हैं—
जो दस बीस पचास भये सत, होइ हजार तो लाख भँगैगी। कोटि अरब्ब खरब्ब असंख्य, पृथ्वीपति होन की चाह जगैगी ॥ स्वर्ग पतालको राज करें, तृष्णा अघकी अति आग लगैगी। ‘सुन्दर’ एक संतोष बिना सठ, तेरी तो भूख कभी न भगैगी ॥
जैसे, सौ रुपये मिलनेपर हजार रुपयोंकी भूख पैदा होती है, तो इससे सिद्ध हुआ कि नौ सौ रुपयोंका घाटा हुआ है। हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे दस हजार रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो यह नौ हजार रुपयोंका घाटा हुआ है। दस हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे एक लाख रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो यह नब्बे हजार
रुपयोंका घाटा हुआ है। लाख रुपये मिलनेपर फिर दस लाख रुपयोंसे सन्तोष नहीं होता, प्रत्युत सीधे करोड़ रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है, तो सिद्ध हुआ कि निन्यानबे लाख रुपयोंका घाटा हुआ है। इस प्रकार वहम तो यह होता है कि लाभ बढ़ गया, पर वास्तवमें घाटा ही बढ़ा है। जितना धन मिलता है, उतनी ही दरिद्रता (धनकी भूख) बढ़ती है। वास्तवमें दरिद्रता उसकी मिटती है, जिसे धनकी भूख नहीं है।
चाह गयी चिन्ता मिटी, मनुओं बेपरवाह।
जिनको कष्ट न चाहिये, सो साहनपति साह॥
वास्तवमें धन उतना बाधक नहीं है, जितनी बाधक उसकी कामना है। धनकी कामना चाहे धनीमें हो या निर्धनमें, दोनोंको वह परमात्मप्राप्तिसे वंचित रखती है। कामना किसीकी भी कभी पूरी नहीं होती; क्योंकि यह पूरी होनेवाली चीज ही नहीं है। कामनासे रहित तो कामनाके मिटनेपर ही हो सकते हैं।
‘कामरूपेण’ —जड़के सम्बन्धसे होनेवाले सुखकी चाहको ‘काम’ कहते हैं। नाशवान् संसारमें थोड़ी भी महत्त्व-बुद्धिका होना ‘काम’ है।
अप्राप्तको प्राप्त करनेकी चाह ‘कामना’ है। अन्तःकरणमें जो अनेक सूक्ष्म कामनाएँ दबी रहती हैं, उनको ‘वासना’ कहते हैं। वस्तुओंकी आवश्यकता प्रतीत होना ‘स्मृता’ है। वस्तुमें उत्तमता और प्रियता दीखना ‘आसक्ति’ है। वस्तु मिलनेकी सम्भावना रखना ‘आशा’ है। और अधिक वस्तु
- न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्तैव भूय एवाभिवर्धते ॥
(श्रीमद्भा० ९।१९।१४; मनुस्मृति २।१४)