श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ३
'देहिनम् विमोहयति' - पदोंका तात्पर्य यह है कि
यह काम देहाभिमानी पुरुषको ही मोहित करता है।
शरीरको 'मैं' और 'मेरा' माननेवाला ही देहाभिमानी होता
है। भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें ही देह (शरीर)
और देही (शरीरी-आत्मा)-का विवेचन किया है (गीता-
दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक)। देह और
देही दोनों अलग-अलग हैं-यह सबका अनुभव है। यह
काम ज्ञानको ढककर देहाभिमानी-(देहसे अपना सम्बन्ध
माननेवाले-) को बाँधता है, देही-(शुद्ध स्वरूप-) को नहीं।
जो देहके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता, उसे यह बाँध
नहीं सकता। देहको 'मैं' 'मेरा' और 'मेरे लिये' माननेसे ही
मनुष्य उत्पत्ति-विनाशशील जड वस्तुओंको महत्त्व देता है;
जिससे उसमें जडताका राग उत्पन्न हो जाता है। राग उत्पन्न
होनेपर जडतासे सम्बन्ध हो जाता है। जडतासे सम्बन्ध
होनेपर ही कामनाकी उत्पत्ति होती है। कामना उत्पन्न
होनेपर जीव मोहित होकर संसार-बन्धनमें बँध जाता है।
सम्बन्ध-अब आगेके तीन श्लोकोंमें भगवान् कामको मारनेका प्रकार बताते हुए उसे मारनेकी आज्ञा देते हैं।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥ ४१॥
तस्मात् = इसलिये | इन्द्रियाणि = इन्द्रियोंको | करनेवाले
भरतर्षभ = हे भरतवंशियोंमें | नियम्य = वशमें करके | पाप्मानम् = महान् पापी
श्रेष्ठ अर्जुन ! | एनम् = इस | कामको
त्वम् = तू | ज्ञानविज्ञाननाशनम् = ज्ञान और | हि = अवश्य ही
आदौ = सबसे पहले | विज्ञानका नाश | प्रजहि = बलपूर्वक मार डाल।
व्याख्या-'तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ'-
इन्द्रियोंको विषयोंमें भोग-बुद्धिसे प्रवृत्त न होने देना, अपितु
केवल निर्वाह-बुद्धिसे अथवा साधन-बुद्धिसे प्रवृत्त होने
देना ही उनको वशमें करना है। तात्पर्य है कि इन्द्रियोंकी
विषयोंमें रागपूर्वक प्रवृत्ति न हो और द्वेषपूर्वक निवृत्ति न
हो। (गीता-अठारहवें अध्यायका दसवाँ श्लोक) रागपूर्वक
प्रवृत्ति और द्वेषपूर्वक निवृत्ति होनेसे राग-द्वेष पुष्ट हो जाते
हैं और न चाहते हुए भी मनुष्यको पतनकी ओर ले जाते
हैं। इसलिये प्रवृत्ति और निवृत्ति अथवा कर्तव्य और
अकर्तव्यको जाननेके लिये शास्त्र ही प्रमाण है। (गीता-
सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक) शास्त्रके अनुसार
कर्तव्यका पालन और अकर्तव्यका त्याग करनेसे इन्द्रियाँ
वशमें हो जाती हैं।
'काम' को मारनेके लिये सबसे पहले इन्द्रियोंका
नियमन करनेके लिये कहनेका कारण यह है कि जबतक
मनुष्य इन्द्रियोंके वशमें रहता है, तबतक उसकी दृष्टि
तत्त्वकी ओर नहीं जाती; और तत्त्वकी ओर दृष्टि गये
बिना अर्थात् तत्त्वका अनुभव हुए बिना 'काम' का सर्वथा
नाश नहीं होता।
मनुष्यकी प्रवृत्ति इन्द्रियोंसे ही होती है। इसलिये वह
सबसे पहले इन्द्रियोंके विषयोंमें ही फँसता है, जिससे उसमें
उन विषयोंकी कामना पैदा हो जाती है। कामना-सहित
कर्म करनेसे मनुष्य पूरी तरह इन्द्रियोंके वशमें हो जाता है
और इससे उसका पतन हो जाता है। परन्तु जो मनुष्य
इन्द्रियोंको वशमें करके निष्काम-भावपूर्वक कर्तव्य-कर्म
करता है, उसका शीघ्र ही उद्धार हो जाता है।
'एनम् ज्ञानविज्ञाननाशनम्'-'ज्ञान' पदका अर्थ
शास्त्रीय ज्ञान भी लिया जाता है; जैसे-ब्राह्मणके
स्वाभाविक कर्मोंके अन्तर्गत 'ज्ञानम्' पद शास्त्रीय
ज्ञानके लिये ही आया है। (गीता-अठारहवें अध्यायका
बयालीसवाँ श्लोक)। परन्तु यहाँ प्रसंगके अनुसार 'ज्ञान'
का अर्थ विवेक (कर्तव्य-अकर्तव्यको अलग-अलग
जानना) लेना ही उचित प्रतीत होता है। 'विज्ञान' पदका
अर्थ विशेष ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान (अनुभव-ज्ञान, असली
ज्ञान या बोध) है।
विवेक और तत्त्वज्ञान-दोनों ही स्वतःसिद्ध हैं। तत्त्व-
ज्ञानका अनुभव तो सबको नहीं है, पर विवेकका अनुभव
सभीको है। मनुष्यमें यह विवेक विशेषरूपसे है। अर्जुनके
प्रश्न-(मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है?)
में आये 'अनिच्छन्नपि' पदसे भी यही सिद्ध होता है कि