भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ४२-४३ ]

  • साधक-संजीवनी *

२७९

सुखी-दुःखी होता है, कर्ता-भोक्ता होता है। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो काम अपनेमें माना हुआ है, अपनेमें है नहीं, तभी यह मिटता है। अतः काम अपनेमें नहीं है, पर माना हुआ है।

अहममें रहनेवाली चीजको मनुष्य अपनेमें मान लेता है। अपनेमें अहम् माना हुआ है और उस अहममें काम रहता है। अतः जबतक अहम् है, तबतक अहमकी जातिका आकर्षण अर्थात् 'काम' होता है और जब अहम् नहीं रहता, तब स्वयंकी जातिका आकर्षण अर्थात् 'प्रेम' होता है। काममें संसारकी तरफ और प्रेममें परमात्माकी तरफ आकर्षण होता है।

सम्पूर्ण त्रिलोकी, अनन्त ब्रह्माण्ड 'विषय' है। विषय इन्द्रियोंके एक देशमें हैं, इन्द्रियाँ मनके एक देशमें हैं, मन बुद्धिके एक देशमें हैं, बुद्धि अहमके एक देशमें है और अहम् चेतन (स्वरूप)-के एक देशमें है। अतः चेतन अत्यन्त महान् है, जिसके अन्तर्गत सम्पूर्ण त्रिलोकी, अनन्त ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं। परन्तु अपरा प्रकृतिके एक अंश अहमके साथ अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण मनुष्य अपनेको अत्यन्त छोटा (एकदेशीय) देखता है!

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'कर्मयोग' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

इस तीसरे अध्यायका नाम 'कर्मयोग' है; क्योंकि कर्मयोगका जितना विशद वर्णन तीसरे अध्यायमें है, उतना गीताके अन्य अध्यायोंमें नहीं है।

तीसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथ तृतीयोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके आठ श्लोकोंके पाँच सौ बयालीस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ छाछठ है।

(२) इस अध्यायमें 'अथ तृतीयोऽध्यायः' के सात, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके छब्बीस, श्लोकोंके एक हजार तीन सौ छिहत्तर और पुष्पिकाके पैतालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार चार सौ चौवन है। इस अध्यायके सभी श्लोक बतीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें चार उवाच हैं—दो 'अर्जुन उवाच' और दो 'श्रीभगवानुवाच'।

तीसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके तैतालीस श्लोकोंमेंसे—पहले और सँतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा ग्यारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला'; पाँचवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला'; उन्नीसवें, छब्बीसवें, और पैतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा आठवें और इक्कीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; और सातवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'नगण' और तृतीय चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे 'संकीर्ण-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष तैतीस श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।