भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

२७९

अतः ज्ञानयोगी और भक्तियोगीको कर्मयोगका सिद्धान्त तो अपनाना ही पड़ेगा; भले ही वे कर्मयोगका अनुष्ठान न करें। तात्पर्य यह कि वर्तमानमें कर्मयोग लुप्तप्राय होनेपर भी सिद्धान्तके रूपमें विद्यमान ही है।

वास्तवमें देखा जाय तो कर्मयोगमें 'कर्म' लुप्त नहीं हुए हैं, प्रत्युत (कर्मोंका प्रवाह अपनी ओर होनेसे) 'योग' ही लुप्त हुआ है। तात्पर्य यह है कि जैसे संसारके पदार्थ कर्म करनेसे मिलते हैं, ऐसे ही परमात्मा भी कर्म करनेसे मिलेंगे—यह बात साधकोंके अन्तःकरणमें इतनी दृढ़तासे बैठ गयी है कि 'परमात्मा नित्यप्राप्त है'—इस वास्तविकताकी ओर उनका ध्यान ही नहीं जा रहा है। 'कर्म' सदैव संसारके लिये होते हैं और 'योग' सदैव अपने लिये होता है। 'योग' के लिये कर्म करना नहीं होता, वह तो स्वतःसिद्ध है। अतः 'योग' के लिये यह मान लेना कि वह कर्म

करनेसे होगा—यही 'योग'का लुप्त होना है।

मनुष्य-शरीर कर्मयोगका पालन करनेके लिये अर्थात् दूसरोंकी निःस्वार्थ सेवा करनेके लिये ही मिला है। परन्तु आज मनुष्य रात-दिन अपनी सुख-सुविधा, सम्मान आदिकी प्राप्तिमें ही लगा हुआ है। स्वार्थके अधिक बढ़ जानेके कारण दूसरोंकी सेवाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं है। इस प्रकार जिसके लिये मनुष्य-शरीर मिला है, उसे भूल जाना ही कर्मयोगका लुप्त होना है।

मनुष्य सेवाके द्वारा पशु-पक्षीसे लेकर मनुष्य, देवता, पितर, ऋषि, सन्त-महात्मा और भगवान्‌तकको अपने वशमें कर सकता है। परन्तु सेवाभावको भूलकर मनुष्य स्वयं भोगोंके वशमें हो गया, जिसका परिणाम नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें पड़ जाना है। यही कर्मयोगका छिपना है।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥

मे= (तू) मेरासः, एव= वही
भक्तः= भक्तअयम्= यह
= औरपुरातनः= पुरातन
सखा= (प्रिय) सखायोगः= योग
असि= है,अद्य= आज
इति= इसलियेमया= मैंने

व्याख्या —'भक्तोऽसि मे सखा चेति'—अर्जुन भगवान्‌को अपना प्रिय सखा पहलेसे ही मानते थे (गीता—ग्यारहवें अध्यायका इकतालीसवाँ-बयालीसवाँ श्लोक), पर भक्त अभी (गीता—दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें) हुए हैं अर्थात् अर्जुन सखा भक्त तो पुराने हैं, पर दास्य भक्त नये हैं। आदेश या उपदेश दास अथवा शिष्यको ही दिया जाता है, सखाको नहीं। अर्जुन जब भगवान्‌के शरण हुए, तभी भगवान्‌का उपदेश आरम्भ हुआ।

जो बात सखासे भी नहीं कही जाती, वह बात भी

शरणागत शिष्यके सामने प्रकट कर दी जाती है। अर्जुन भगवान्‌से कहते हैं कि 'मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये।' इसलिये भगवान्‌ अर्जुनके सामने अपने-आपको प्रकट कर देते हैं, रहस्यको खोल देते हैं।

अर्जुनका भगवान्‌के प्रति बहुत विशेष भाव था, तभी तो उन्होंने वैभव और अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित 'नारायणी सेना' का त्याग करके निःशस्त्र भगवान्‌को अपने 'सारथि' के रूपमें स्वीकार किया।

१-लोकहितार्थ अपने कर्तव्य-(स्वधर्म- ) का पालन करनेसे 'योग' सिद्ध होता है; अतः यह 'करना' भी वास्तवमें न करनेके लिये अर्थात् 'करना' समाप्त करनेके लिये ही है—'आरुरुक्षोमुनेर्यां कर्म कारणमुच्यते' (गीता ६।३)। 'करनेका वेग' निकालनेके लिये ही केवल सेवा-भावसे कर्तव्य-कर्म करने चाहिये। सकामभावसे अर्थात् अपने लिये कर्म करनेसे 'करनेका वेग' बढ़ता है, और दूसरोंके लिये कर्म करनेसे 'करनेका वेग' समाप्त होता है। तात्पर्य यह कि दूसरोंके लिये करनेसे ही 'करना' समाप्त होता है, और अपने लिये करनेसे 'करना' शेष रहता है। 'करना' समाप्त होनेपर स्वतःसिद्ध 'योग'का अनुभव हो जाता है।

२-एवमुक्तस्तु कृष्णो न कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम् ॥

(महाभारत, उद्योग ७।२१)