श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ६ ] * साधक-संजीवनी * २८९
हृदयसे सटा रहे हों!'
भगवान् श्रीरामके सौन्दर्यको देखकर विदेह राजा
जनक भी विदेह अर्थात् देहकी सुध-बुधसे रहित हो जाते हैं-
मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेह बिदेह बिसेषी॥
(मानस १।२१५।४)
और कहते हैं-
सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥
(मानस १।२१६।२)
वनमें रहनेवाले कोल-भील भी भगवान्के विग्रहको
देखकर मुग्ध हो जाते हैं-
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे॥
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े॥
(मानस २।१३५।३)
प्रेमियोंकी तो बात ही क्या, वैरभाव रखनेवाले राक्षस
खर-दूषण भी भगवान्के विग्रहकी सुन्दरताको देखकर
चकित हो जाते हैं और कहते हैं-
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥
(मानस ३।१९।२)
तात्पर्य है कि भगवान्के दिव्य सौन्दर्यकी ओर प्रेमी,
विरक्त, ज्ञानी, मूर्ख, वैरी, असुर और राक्षसतक सबका मन
आकृष्ट हो जाता है।
‘सम्भवाम्यात्ममायया’—जो मनुष्य भगवान्से विमुख
रहते हैं, उनके सामने भगवान् अपनी योगमायामें छिपे रहते
हैं और साधारण मनुष्य-जैसे ही दीखते हैं। मनुष्य ज्यों-
ज्यों भगवान्के सम्मुख होता जाता है, त्यों-त्यों भगवान्
उसके सामने प्रकट होते जाते हैं। इसी योगमायाका आश्रय
लेकर भगवान् विचित्र-विचित्र लीलाएँ करते हैं।
भगवद्विमुख मूढ़ पुरुषके आगे दो परदे रहते हैं-
एक तो अपनी मूढ़ताका और दूसरा भगवान्की योग-
मायाका (गीता-सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)।
अपनी मूढ़ता रहनेके कारण भगवान्का प्रभाव साक्षात् सामने
प्रकट होनेपर भी वह उसे समझ नहीं सकता; जैसे-
द्रौपदीका चीर-हरण करनेके लिये दु:शासन अपना पूरा
बल लगाता है, उसकी भुजाएँ थक जाती हैं, पर साड़ीका
अन्त नहीं आता-
द्रुपद सुता निरबल भइ ता दिन, तजि आये निज धाम।
दुस्सासन की भुजा थकित भई, बसन-रूप भए स्याम॥
-इस प्रकार भगवान्ने सभाके भीतर अपना ऐश्वर्य
साक्षात् प्रकट कर दिया। परन्तु अपनी मूढ़ताके कारण
दु:शासन, दुर्योधन, कर्ण आदिपर इस बातका कोई असर
ही नहीं पड़ा कि द्रौपदीके द्वारा भगवान्को पुकारनेमात्रसे
कितनी विलक्षणता प्रकट हो गयी! एक स्त्रीका चीरहरण
भी नहीं कर सके तो और क्या कर सकते हैं! इस तरफ
उनकी दृष्टि ही नहीं गयी। भगवान्का प्रभाव सामने देखते
हुए भी वे उसे जान नहीं सके।
यदि जीव अपनी मूढ़ता (अज्ञान) दूर कर दे तो उसे
अपने स्वरूपका अथवा परमात्मतत्त्वका बोध तो हो जाता
है, पर भगवान्के दर्शन नहीं होते। भगवान्के दर्शन तभी
होते हैं, जब भगवान् अपनी योगमायाका परदा हटा देते
हैं। अपना अज्ञान मिटाना तो जीवके हाथकी बात है, पर
योग-मायाको दूर करना उसके हाथकी बात नहीं है। वह
सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् अपनी शक्तिसे
उसका अज्ञान भी मिटा सकते हैं और दर्शन भी दे सकते हैं।
भगवान् जितनी लीलाएँ करते हैं, सब योगमायाका
आश्रय लेकर ही करते हैं। इसी कारण उनकी लीलाको
देख सकते हैं, उसका अनुभव कर सकते हैं। यदि वे योग-
मायाका आश्रय न लें तो उनकी लीलाको कोई देख ही
नहीं सकता, उसका आस्वादन कोई कर ही नहीं सकता।
अवतार-सम्बन्धी विशेष बात
अवतारका अर्थ है-नीचे उतरना। सब जगह परिपूर्ण
रहनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा अपने अनन्य भक्तोंकी
इच्छा पूरी करनेके लिये अत्यधिक कृपासे एक स्थान-
विशेषमें अवतार लेते हैं और छोटे बन जाते हैं। दूसरे
लोगोंका प्रभाव या महत्त्व तो बड़े हो जानेसे होता है, पर
भगवान्का प्रभाव या महत्त्व छोटे हो जानेसे होता है। कारण
१-योगमायाका आश्रय लेकर ही भगवान् रासलीला करते हैं-
भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमालिका:। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रित:॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१)
२-अपने स्वरूपका बोध होनेपर भगवान्के दर्शन हो जायँ-ऐसा नियम नहीं है। परन्तु भगवान्के दर्शन होनेपर अपने
स्वरूपका बोध भी हो जाता है। इसलिये भगवान् कहते हैं-
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥ (मानस ३।३६।५)