भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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२९२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ४

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपने अवतारके अवसरका वर्णन करके अब भगवान् अपने अवतारका प्रयोजन बताते हैं।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ८ ॥

साधूनाम् = साधुओं

(भक्तों)-की

परित्राणाय = रक्षा करनेके लिये,

दुष्कृताम् = पापकर्म

करनेवालोंका

विनाशाय = विनाश करनेके

लिये

च = और

धर्मसंस्थापनार्थाय = धर्मकी

भलीभाँति

स्थापना करनेके

लिये (मैं)

युगे, युगे = युग-युगमें

सम्भवामि = प्रकट हुआ

करता हूँ।

व्याख्या—'परित्राणाय साधूनाम्'—साधु मनुष्योंके

द्वारा ही अधर्मका नाश और धर्मका प्रचार होता है, इसलिये

उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।

दूसरोंका हित करना ही जिनका स्वभाव है और जो

भगवान्‌के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, लीला आदिका श्रद्धा-

प्रेमपूर्वक स्मरण, कीर्तन आदि करते हैं और लोगोंमें भी

इसका प्रचार करते हैं, ऐसे भगवान्‌के आश्रित भक्तोंके

लिये यहाँ 'साधूनाम्' पद आया है।

जिसका एकमात्र परमात्म-प्राप्तिका उद्देश्य है, वह

साधु है* और जिसका नाशवान् संसारका उद्देश्य है, वह

असाधु है।

असत् और परिवर्तनशील वस्तुमें सद्भाव करने और

उसे महत्त्व देनेसे कामनाएँ पैदा होती हैं। ज्यों-ज्यों

कामनाएँ नष्ट होती हैं, त्यों-त्यों साधुता आती है और

ज्यों-ज्यों कामनाएँ बढ़ती हैं, त्यों-त्यों साधुता लुप्त होती

है। कारण कि असाधुताका मूल हेतु कामना ही है। साधुतासे

अपना उद्धार और लोगोंका स्वतः उपकार होता है।

साधु पुरुषके भावों और क्रियाओंमें पशु, पक्षी, वृक्ष,

पर्वत, मनुष्य, देवता, पितर, ऋषि, मुनि आदि सबका हित

भरा रहता है—

हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।

(मानस ७। ४७। ३)

यदि लोग उसके मनके भावोंको जान जायँ तो वे

उसके चरणोंके दास बन जायँ। इसके विपरीत यदि लोग

दुष्ट पुरुषके मनके भावोंको जान जायँ तो दिनमें कई बार

लोगोंसे उसकी पिटाई हो।

यहाँ शंका हो सकती है कि यदि भगवान् साधु

पुरुषोंकी रक्षा किया करते हैं तो फिर संसारमें साधु पुरुष

दुःख पाते हुए क्यों देखे जाते हैं? इसका समाधान यह है

कि साधु पुरुषोंकी रक्षाका तात्पर्य उनके भावोंकी रक्षा है;

शरीर, धन-सम्पत्ति, मान-बड़ाई आदिकी रक्षा नहीं; कारण

कि वे इन सांसारिक पदार्थोंको महत्त्व नहीं देते। भगवान्

भी इन वस्तुओंको महत्त्व नहीं देते; क्योंकि सांसारिक

पदार्थोंको महत्त्व देनेसे ही असाधुता पैदा होती है।

भक्तोंमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व, उद्देश्य होता ही

नहीं; तभी तो वे भक्त हैं। भक्तलोग प्रतिकूलता-(दुःखदायी

परिस्थिति-) में विशेष प्रसन्न होते हैं; क्योंकि प्रतिकूलतासे

जितना आध्यात्मिक लाभ होता है, उतना किसी दूसरे

साधनसे नहीं होता। वास्तवमें भक्ति भी प्रतिकूलतामें ही

बढ़ती है। सांसारिक राग, आसक्तिसे ही पतन होता है और

प्रतिकूलतासे वह राग टूटता है। इसलिये भगवान्‌का भक्तोंके

लिये प्रतिकूलता भेजना भी वास्तवमें भक्तोंकी रक्षा करना

है।

'विनाशाय च दुष्कृताम्'—दुष्ट मनुष्य अधर्मका

प्रचार और धर्मका नाश करते हैं, इसलिये उनका विनाश

करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।

जो मनुष्य कामनाके अत्यधिक बढ़नेके कारण झूठ,

कपट, छल, बेईमानी आदि दुर्गुण-दुराचारोंमें लगे हुए हैं,

जो निरपराध सद्गुण, सदाचारी, साधुओंपर अत्याचार

किया करते हैं, जो दूसरोंका अहित करनेमें ही लगे रहते

हैं, जो प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते, भगवान् और

वेद-शास्त्रोंका विरोध करना ही जिनका स्वभाव हो गया

है, ऐसे आसुरी सम्पत्तिमें अधिक रचे-पचे रहकर वैसा

ही बुरा आचरण करनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ 'दुष्कृताम्'

पद आया है। भगवान् अवतार लेकर ऐसे ही दुष्ट

मनुष्योंका विनाश करते हैं।

  • साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः। (गीता ९। ३०)