भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक १]

  • साधक-संजीवनी *

२१५

(१) जाननेमें अन्तर—मनुष्योंके और भगवान्के बहुत-से जन्म हो चुके हैं। उन सब जन्मोंको मनुष्य तो नहीं जानते, पर भगवान् जानते हैं (४।५)।

(२) जन्ममें अन्तर—मनुष्य प्रकृतिके परवश होकर, अपने किये हुए पाप-पुण्योंका फल भोगनेके लिये और फलभोगपूर्वक परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये जन्म लेता है, पर भगवान् अपनी प्रकृतिको अधीन करके स्वाधीनतापूर्वक

अपनी योगमायासे स्वयं प्रकट होते हैं (चौथे अध्यायका छठा श्लोक)।

(३) कार्यमें अन्तर—साधारणतः मनुष्य अपनी कामनाओंकी पूर्तिके लिये कार्य करते हैं, जो कि मनुष्यजन्मका ध्येय नहीं है, पर भगवान् केवल मात्र जीवोंके कल्याणके लिये कार्य करते हैं (चौथे अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—चौथे श्लोकमें आये अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने अपने जन्मकी दिव्यताका वर्णन आरम्भ किया था। अब अपनी ओरसे निष्काम-कर्म-(कर्मयोग-) का तत्त्व बतानेके उद्देश्यसे अपने जन्मकी दिव्यताके साथ-साथ अपने कर्मकी दिव्यताको जाननेका भी माहात्म्य बताते हैं।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ १ ॥

अर्जुन= हे अर्जुन!जन्म और कर्मको)देहम्= शरीरका
मे= मेरेयः= जो मनुष्यत्यक्त्वा
जन्म= जन्मतत्त्वतः= तत्त्वसेपुनः, जन्म
= औरवेत्ति= जान लेता है अर्थात्न, एति
कर्म= कर्मदृढ़तापूर्वक मान
दिव्यम्= दिव्य हैं।लेता है,माम्
एवम्= इस प्रकार (मेरेसः= वहएति

व्याख्या—‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’—भगवान् जन्म-मृत्युसे सर्वथा अतीत—अजन्मा और अविनाशी हैं। उनका मनुष्यरूपमें अवतार साधारण मनुष्योंकी तरह नहीं होता। वे कृपापूर्वक मात्र जीवोंका हित करनेके लिये स्वतन्त्रतापूर्वक मनुष्य आदिके रूपमें जन्म-धारणकी लीला करते हैं। उनका जन्म कर्मके परवश नहीं होता। वे अपनी इच्छासे ही शरीर धारण करते हैं*।

भगवान्का साकार विग्रह जीवोंके शरीरोंकी तरह हाड़-मांसका नहीं होता। जीवोंके शरीर तो पाप-पुण्यमय, अनित्य, रोगग्रस्त, लौकिक, विकारी, पांचभौतिक और रज-वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले होते हैं, पर भगवान्के विग्रह

पाप-पुण्यसे रहित, नित्य, अनामय, अलौकिक, विकाररहित, परम दिव्य और प्रकट होनेवाले होते हैं। अन्य जीवोंकी अपेक्षा तो देवताओंके शरीर भी दिव्य होते हैं, पर भगवान्का शरीर उनसे भी अत्यन्त विलक्षण होता है, जिसका देवतालोग भी सदा ही दर्शन चाहते रहते हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायका बावनवाँ श्लोक)।

भगवान् जब श्रीराम तथा श्रीकृष्णके रूपमें इस पृथ्वीपर आये, तब वे माता कौसल्या और देवकीके गर्भसे उत्पन्न नहीं हुए। पहले उन्हें अपने शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी स्वरूपका दर्शन देकर फिर वे माताकी प्रार्थनापर बालरूपमें लीला करने लगे। भगवान् श्रीरामके लिये गोस्वामी

  • (१) ‘निज इच्छां प्रभु अवतरद्’ (मानस ४।२६)

(२) बिप्र धेनु सूर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।

निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥

(मानस १।११२)

(३) उद्धवजी भगवान्से कहते हैं—

(३) त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः। अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः॥

(श्रीमद्भा० ११।११।२८)

‘आप प्रकृतिसे परे पुरुषोत्तम एवं चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म हैं। फिर भी आपने स्वेच्छासे ही यह अलग शरीर धारण करके अवतार लिया है।’