भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 302

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

३०९

है*। भगवान्‌के जन्म-कर्मके तत्त्वको जाननेसे जब नाशवान्‌ पदार्थोंका आकर्षण, उनकी ममता सर्वथा मिट जाती है, तब सब मलिनता नष्ट हो जाती है और मनुष्य परम पवित्र हो जाता है।

कर्मयोगका प्रसंग होनेसे उपर्युक्त पदोंमें आये ‘ज्ञान’ शब्दका अर्थ कर्मयोगका ज्ञान भी माना जा सकता है। कर्मयोगका ज्ञान है—शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पद, योग्यता, अधिकार, धन, जमीन आदि मिली हुई मात्र वस्तुएँ संसारकी और संसारके लिये ही हैं, अपनी और अपने लिये नहीं हैं। कारण कि स्वयं (स्वरूप) नित्य है; अतः उसके साथ अनित्य वस्तु कैसे रह सकती है तथा उसके काम भी कैसे आ सकती है? शरीरादि वस्तुएँ जन्मसे पहले भी हमारे साथ नहीं थीं और मरनेके बाद भी नहीं रहेंगी तथा इस समय भी उनका प्रतिक्षण हमसे सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है। इन मिली हुई वस्तुओंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है, अपनी माननेका अधिकार नहीं। ये वस्तुएँ संसारकी ही हैं; अतः इन्हें संसारकी ही सेवामें लगाना है। यही इनका सदुपयोग है। इनको अपनी और अपने लिये मानना ही वास्तवमें बन्धन या अपवित्रता है।

इस प्रकार नाशवान्‌ वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानना ‘ज्ञानतप’ है; जिससे मनुष्य परम पवित्र हो

जाता है। जितने भी तप हैं, उन सबसे बढ़कर ‘ज्ञानतप’ है। इस ज्ञानतपसे जड़के साथ माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है। जबतक मनुष्य जड़के साथ अपना सम्बन्ध मानता रहता है, तबतक दूसरी तपस्यासे उसकी उतनी पवित्रता नहीं होती, जितनी पवित्रता ज्ञानतपसे जड़का सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे होती है। इस ज्ञानतपसे पवित्र होकर मनुष्य भगवान्‌के भाव-(सत्ता-) को अर्थात् सच्चिदानन्दधन परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि जैसे भगवान्‌ नित्य-निरन्तर रहते हैं, ऐसे वह भी उनमें नित्य-निरन्तर रहता है; जैसे भगवान्‌ निलिप्त-निर्विकार रहते हैं, ऐसे वह भी निलिप्त-निर्विकार रहता है; जैसे भगवान्‌के लिये कुछ भी करना शेष नहीं है, ऐसे ही उसके लिये भी कुछ करना शेष नहीं रहता। ज्ञानमार्गसे भी मनुष्य इसी प्रकार भगवान्‌के भावको प्राप्त हो जाता है (गीता—चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

पहले भी बहुत-से भक्त ज्ञानतपसे पवित्र होकर भगवान्‌को प्राप्त हो चुके हैं। अतः साधकोंको वर्तमानमें ही ज्ञानतपसे पवित्र होकर भगवान्‌को प्राप्त कर लेना चाहिये। भगवान्‌को प्राप्त करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं, कोई भी परतन्त्र नहीं है। कारण कि मानव-शरीर भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है।

सम्बन्ध—जन्मकी दिव्यताका वर्णन तो हो गया, अब कर्मोंकी दिव्यता क्या होती है—इस विषयका आरम्भ करते हैं।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन!अहम्= मैंमनुष्याः= सभी मनुष्य
ये= जो भक्ततान्= उन्हेंसर्वशः= सब प्रकारसे
यथा= जिस प्रकारतथा, एव= उसी प्रकारमम= मेरे
माम्= मेरीभजामि= आश्रय देता हूँ;वर्त्त= मार्गका
प्रपद्यन्ते= शरण लेते हैं,(क्योंकि)अनुवर्त्तन्ते= अनुसरण करते हैं।

व्याख्या—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’— भक्त भगवान्‌की जिस भावसे, जिस सम्बन्धसे, जिस प्रकारसे शरण लेता है, भगवान्‌ भी उसे उसी भावसे, उसी सम्बन्धसे, उसी प्रकारसे आश्रय देते हैं। जैसे, भक्त भगवान्‌को अपना गुरु मानता है तो वे श्रेष्ठ गुरु बन जाते हैं, शिष्य मानता है तो वे श्रेष्ठ शिष्य बन जाते हैं, माता-

पिता मानता है तो वे श्रेष्ठ माता-पिता बन जाते हैं, पुत्र मानता है तो वे श्रेष्ठ पुत्र बन जाते हैं, भाई मानता है तो वे श्रेष्ठ भाई बन जाते हैं, सखा मानता है तो वे श्रेष्ठ सखा बन जाते हैं, नौकर मानता है तो वे श्रेष्ठ नौकर बन जाते हैं। भक्त भगवान्‌के बिना व्याकुल हो जाता है तो भगवान्‌ भी भक्तके बिना व्याकुल हो जाते हैं।

  • ‘ममता मल जरि जाड़’ (मानस ७।११७ क); ‘ममतामेधदूषितः’ (योगवासिष्ठ ६।२।५३।११)