भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 304

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

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अर्थात् शरणागतिका ही विषय है; उनसे द्वेष, वैर आदिका विषय नहीं। अतः यहाँ इस विषयमें शंका ही नहीं उठ सकती। फिर भी इसपर थोड़ा विचार करें तो भगवान्‌के स्वीकार करनेका तात्पर्य है—कल्याण करना। जो भगवान्‌को जिस भावसे स्वीकार करता है, भगवान्‌ भी उससे वैसा ही आचरण करके अन्तमें उसका कल्याण ही करते हैं। भगवान्‌ प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। इसलिये जिसका जिसमें हित होता है, भगवान्‌ उसके लिये वैसा ही प्रबन्ध कर देते हैं। वैर-द्वेष रखनेवालोंका भी जिससे कल्याण हो जाय, वैसा ही भगवान्‌ करते हैं। [वैर-द्वेष रखनेवाले भगवान्‌का बिगाड़ भी क्या कर लेंगे?] अंगदजीको रावणकी सभामें भेजते समय भगवान्‌ श्रीराम कहते हैं कि वही बात कहना, जिससे हमारा काम भी हो और रावणका हित भी हो—‘काजु हमार तासु हित होई’ (मानस ६।१७।४)।

भगवान्‌की सुहृताकी तो बात ही क्या, भक्त भी समस्त प्राणियोंके सुहृद् होते हैं—‘सुहृदः सर्वदेहिनाम्’ (श्रीमद्भा० ३।२५।२१)। जब भक्तोंसे भी किसीका किंचिन्मात्र भी अहित नहीं होता, तब भगवान्‌से किसीका अहित हो ही कैसे सकता है? भगवान्‌से किसी प्रकारका भी सम्बन्ध जोड़ा जाय, वह कल्याण करनेवाला ही होता है; क्योंकि भगवान्‌ परम दयालु, परम सुहृद् और चिन्मय हैं। जैसे गंगामें स्नान वैशाख मासमें किया जाय अथवा माघ मासमें, दोनोंका ही माहात्म्य एक समान है। परन्तु वैशाखके स्नानमें जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी प्रसन्नता माघके स्नानमें नहीं होती। इसी प्रकार भक्ति-प्रेमपूर्वक भगवान्‌से सम्बन्ध जोड़नेवालोंको जैसा आनन्द होता है, वैसा आनन्द वैर-द्वेषपूर्वक भगवान्‌से सम्बन्ध जोड़नेवालोंको नहीं होता।

‘मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः’—श्रेष्ठ

१-कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः।

पुरुष जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी उसीके अनुसार आचरण करने लग जाते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। भगवान्‌ सबसे श्रेष्ठ (सर्वोपरि) हैं, इसलिये सभी लोग उनके मार्गका अनुसरण करते हैं। तीसरे अध्यायमें तेईसवें श्लोकके उत्तरार्धमें भी यही बात (उपर्युक्त पदोंसे ही) कही गयी है।

साधक भगवान्‌के साथ जिस प्रकारका सम्बन्ध मानता है, भगवान्‌ उसके साथ वैसा ही सम्बन्ध माननेके लिये तैयार रहते हैं। महाराज दशरथजी भगवान्‌ श्रीरामको पुत्रभावसे स्वीकार करते हैं, तो भगवान्‌ उनके सच्चे पुत्र बन जाते हैं और सामर्थ्यवान्‌ होकर भी ‘पिता’ दशरथजीके वचनोंको टालनेमें अपनेको असमर्थ मानते हैं। इस प्रकारके आचरणोंसे भगवान्‌ यह रहस्य प्रकट करते हैं कि यदि तुम्हारी संसारमें किसीके साथ सम्बन्धके नाते प्रियता हो तो वही सम्बन्ध तुम मेरे साथ कर लो, जैसे—मातामें प्रियता हो तो मेरेको अपनी माता मान लो, पितामें प्रियता हो तो मेरेको अपना पिता मान लो; पुत्रमें प्रियता हो तो मेरेको अपना पुत्र मान लो, आदि। ऐसा माननेसे मेरेमें वास्तविक प्रियता हो जायगी और मेरी प्राप्ति सुगमतापूर्वक हो जायगी।

दूसरी बात, भगवान्‌ अपने आचरणोंसे यह शिक्षा देते हैं कि जिस प्रकार मेरे साथ जो जैसा सम्बन्ध मानता है, उसके लिये मैं भी वैसा ही बन जाता हूँ, उसी प्रकार तुम्हारे साथ जो जैसा सम्बन्ध मानता है, तुम भी उसके लिये वैसे ही बन जाओ; जैसे—माता-पिताके लिये तुम सुपुत्र बन जाओ, पत्नीके लिये तुम सुयोग्य पति बन जाओ, बहनेके लिये तुम श्रेष्ठ भाई बन जाओ, आदि। परन्तु बदलेमें उनसे कुछ चाहो मत; जैसे—कुछ लेनेकी इच्छासे माता-पिताको अपने न मानकर केवल सेवा करनेके लिये ही उन्हें अपने मानो। ऐसा मानना ही भगवान्‌के मार्गका अनुसरण करना है। अभिमानरहित होकर निःस्वार्थभावसे दूसरेकी सेवा

आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः ॥

(श्रीमद्भा० ७।१।२९)

‘अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्‌में लगाकर एवं अपने सारे पाप धोकर वैसे ही भगवान्‌को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिसे।’

२-अहं हि वचनाद् राज्ञः पतेयमपि पावके। भक्ष्येयं विषं तीक्ष्णं पतेयमपि चार्णवे ॥

(वाल्मीकि०, अयोध्या० १८।२८-२९)

भगवान्‌ श्रीराम कहते हैं—‘मैं महाराज पिताजीके कहनेपर आगमें भी प्रवेश कर सकता हूँ, तीक्ष्ण विषका भी भक्षण कर सकता हूँ और समुद्रमें भी कूद सकता हूँ।’