श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
(गीता ६।३), तो फिर कर्मयोग कर्मजन्म कैसे नहीं है? समाधान —कर्मयोगमें कर्मोंसे और कर्म-सामग्रीसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये ही कर्म किये जाते हैं। योग (परमात्माका नित्य-सम्बन्ध) तो स्वतःसिद्ध और स्वाभाविक है। अतः योग अथवा परमात्मप्राप्ति कर्मजन्म नहीं है। वास्तवमें कर्म सत्य नहीं है, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका विधान सत्य है। कोई भी कर्म जब सत्के लिये किया जाता है, तब उसका परिणाम सत् होनेसे उस कर्मका नाम भी सत् हो जाता है—‘कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ’ (गीता १७।२७)।
अपने लिये कर्म करनेसे ही ‘योग’—(परमात्माके साथ नित्ययोग—) का अनुभव नहीं होता। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म किये जाते हैं, अपने लिये अर्थात् फल-प्राप्तिके लिये नहीं—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु
कदाचन ’ (गीता २।४७)। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँधता है (गीता—तीसरे अध्यायका नवों श्लोक) और दूसरोंके लिये कर्म करनेसे वह मुक्त होता है (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवों श्लोक)। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म करनेसे कर्म और फलसे सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, जो ‘योग’का अनुभव करानेमें हेतु है।
कर्म करनेमें ‘पर’ अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, व्यक्ति, देश, काल आदि परिवर्तनशील वस्तुओंकी सहायता लेनी पड़ती है। ‘पर’की सहायता लेना परतन्त्रता है। स्वरूप ज्यों-का-त्यों है। उसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये उसकी अनुभूतिमें ‘पर’ कहे जानेवाले शरीरादि पदार्थोंके सहयोगकी लेशमात्र भी अपेक्षा, आवश्यकता नहीं है। ‘पर’से माने हुए सम्बन्धका त्याग होनेसे स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है।
सम्बन्ध—आठवें श्लोकमें अपने अवतारके उद्देश्यका वर्णन करके नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको जाननेका माहात्म्य बताया। कर्मजन्म सिद्धि चाहनेसे ही कर्मोंमें अदिव्यता (मलिनता) आती है। अतः कर्मोंमें दिव्यता (पवित्रता) कैसे आती है—इसे बतानेके लिये अब भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका विशेष वर्णन करते हैं।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥
| मया | = मेरे द्वारा | माम् | = मुझ | कर्माणि | = कर्म |
|---|---|---|---|---|---|
| गुणकर्मविभागशः | = गुणों और कर्मोंके विभाग-पूर्वक | अव्ययम् | = अविनाशी परमेश्वरको (तू) | न, लिम्पन्ति | = लिप्त नहीं करते। |
| चातुर्वर्ण्यम् | = चारों वर्णोंकी | अकर्तारम् | = अकर्ता | इति | = इस प्रकार |
| सृष्टम् | = रचना की गयी है। | विद्धि | = जान! (कारण कि) | यः | = जो |
| तस्य | = उस (सृष्टि-रचना आदि)-का | कर्मफले | = कर्मोंके फलमें | माम् | = मुझे |
| कर्तारम् | = कर्ता होनेपर | मे | = मेरी | अभिजानाति | = तत्त्वसे जान लेता है, |
| अपि | = भी | स्पृहा | = स्पृहा | सः | = वह (भी) |
| न | = नहीं है, (इसलिये) | कर्मभिः | = कर्मोंसे | ||
| माम् | = मुझे | न | = नहीं | ||
| बध्यते | = बँधता। |
व्याख्या—‘चातुर्वर्ण्यं * मया सृष्टं गुणकर्म-विभागशः’—पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके अनुसार
सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंमें न्यूनाधिकता रहती है। सृष्टि-रचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार
* ‘चत्वारो वर्णाश्चातुर्वर्ण्यम्’ यहाँपर ‘चतुर्वर्णादीनां स्वार्थे उपसंख्यानम्’ इस वार्तिकसे स्वार्थमें ‘ष्यञ् प्रत्यय’ किया गया है।