भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते। जो मनुष्य कर्म करनेकी इस विद्या-(कर्मयोग-) को जानकर फलेच्छाका त्याग करके कर्म करता है, वह भी कर्मोसे नहीं बाँधता; कारण कि फलेच्छासे ही मनुष्य बाँधता है—‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)। अगर मनुष्य अपने सुखभोगके लिये अथवा धन, मान, बड़ाई, स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये कर्म करता है तो वे कर्म उसे बाँध देते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका नवौं श्लोक)। परन्तु यदि उसका लक्ष्य उत्पत्ति-विनाशशील संसार नहीं है, प्रत्युत वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये निःस्वार्थ सेवा-भावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, तो वे कर्म उसे बाँधते नहीं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। कारण कि दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्मोका प्रवाह संसारकी तरफ

परिशिष्ट भाव —तेरहवें-चौदहवें श्लोकोंमें भगवान्ने बताया कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छासे रहित होकर सृष्टि-रचना आदि कर्म करनेके कारण वे कर्म मुझे नहीं बाँधते। यहाँ भगवान् कहते हैं कि मुमुक्षुओंने भी इसी तरह कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छाका त्याग करके कर्म किये हैं। कारण कि कर्तृत्वाभिमान और फलेच्छा होनेपर ही कर्म बन्धनकारक होते हैं। इसलिये तू भी उसी प्रकारसे कर्म कर।

ज्ञानयोगमें पहले कर्तृत्वाभिमानका त्याग किया जाता है, फिर फलेच्छाका त्याग स्वतः होता है। कर्मयोगमें पहले फलेच्छाका त्याग किया जाता है, फिर कर्तृत्वाभिमानका त्याग सुगमतासे हो जाता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें ‘एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म’ पदोंसे कर्मोंको जाननेकी बात कही गयी थी। अब भगवान् आगेके श्लोकसे कर्मोंको ‘तत्त्व’ से जाननेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं।

किं कर्म किमकर्मिति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥

कर्म= कर्मअपि= भीकहूँगा,
किम्= क्या है (और)मोहिताः= मोहित हो जाते हैं।यत्
अकर्म= अकर्म(अतः)ज्ञात्वा
किम्= क्या है—तत्= वहअशुभात्
इति= इस प्रकारकर्म= कर्म-तत्त्व (मैं)
अत्र= इस विषयमेंते= तुझेमोक्ष्यसे
कवयः= विद्वान्प्रवक्ष्यामि= भलीभाँति

व्याख्या —‘किं कर्म’—साधारणतः मनुष्य-शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको ही कर्म मान लेते हैं तथा शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाएँ बंद होनेको अकर्म मान लेते हैं। परन्तु भगवान्ने शरीर, वाणी और मनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाओंको कर्म माना है—‘शरीरवाडमनोर्भिर्थकर्म पारभते नरः’ (गीता १८।१५)।

हो जाता है, जिससे कर्मोका सम्बन्ध (राग) मिट जाता है और फलेच्छा न रहनेसे नया सम्बन्ध पैदा नहीं होता।

‘कुरु कर्मैव तस्मान्चं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्’ —इन पदोंसे भगवान् अर्जुनको आज्ञा दे रहे हैं कि तू मुमुक्षु है, इसलिये जैसे पहले अन्य मुमुक्षुओंने लोकहितार्थ कर्म किये हैं, ऐसे ही तू भी संसारके हितके लिये कर्म कर।

शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि कर्मकी सब सामग्री अपनेसे भिन्न तथा संसारसे अभिन्न है। वह संसारकी है और संसारकी सेवाके लिये ही मिली है। उसे अपनी मानकर अपने लिये कर्म करनेसे कर्मोका सम्बन्ध अपने साथ हो जाता है। जब सम्पूर्ण कर्म केवल दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं, तब कर्मोका सम्बन्ध हमारे साथ नहीं रहता। कर्मोसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘योग’ अर्थात् परमात्माके साथ हमारे नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव हो जाता है, जो कि पहलेसे ही है।

भावके अनुसार ही कर्मकी संज्ञा होती है। भाव बदलनेपर कर्मकी संज्ञा भी बदल जाती है। जैसे, कर्म स्वरूपसे सात्त्विक दीखता हुआ भी यदि कर्ताका भाव राजस या तामस होता है, तो वह कर्म भी राजस या तामस हो जाता है। जैसे, कोई देवीकी उपासनारूप कर्म कर रहा है, जो स्वरूपसे सात्त्विक है। परन्तु यदि कर्ता उसे किसी