श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १७]
- साधक-संजीवनी *
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कर्म करना अथवा न करना। तात्पर्य है कि कर्म करने
अथवा न करने-दोनों अवस्थाओंमें निर्लिप्त रहे-
'योगस्थ: कुरु कर्माणि' (गीता २। ४८)।
कर्म करनेसे संसारमें और कर्म न करनेसे परमात्मामें
प्रवृत्ति होती है-ऐसा मानते हुए संसारसे निवृत्त होकर
एकान्तमें ध्यान और समाधि लगाना भी कर्म करना ही है।
एकान्तमें ध्यान और समाधि लगानेसे तत्त्वका साक्षात्कार
होगा-इस प्रकार भविष्यमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके
भाव भी कर्मका सूक्ष्म रूप है। कारण कि करनेके
आधारपर ही भविष्यमें तत्त्वप्राप्तिकी आशा होती है। परन्तु
परमात्मतत्त्व करने और न करने-दोनोंसे अतीत है।
भगवान् कहते हैं कि मैं वह कर्म-तत्त्व कहूँगा जिसे
जाननेसे तत्काल परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। इसके
लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि परमात्मतत्त्व
सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, शरीर, इन्द्रियाँ, मन,
बुद्धि, प्राण आदिमें समानरूपसे परिपूर्ण है। मनुष्य
अपनेको जहाँ मानता है, परमात्मा वहीं हैं। कर्म करते समय
अथवा न करते समय-दोनों अवस्थाओंमें परमात्मतत्त्वका
हमारे साथ सम्बन्ध ज्यों-का-त्यों रहता है। केवल
प्रकृतिजन्य क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध माननेके कारण ही
उसकी अनुभूति नहीं हो रही है।
अहंतापूर्वक किया हुआ साधन और साधनका
अभिमान जबतक रहता है, तबतक अहंता मिटती नहीं,
प्रत्युत दृढ़ होती है, चाहे वह अहंता स्थूलरूपसे (कर्म
करनेके साथ) रहे अथवा सूक्ष्मरूपसे (कर्म न करनेके
साथ) रहे।
'मैं करता हूँ'-इसमें जैसी अहंता है, ऐसी ही अहंता
'मैं नहीं करता हूँ'-इसमें भी है। अपने लिये कुछ न
करने अर्थात् कर्ममात्र संसारके हितके लिये करनेसे
अहंता संसारमें विलीन हो जाती है।
सम्बन्ध-अब भगवान् कर्मोंके तत्त्वको जाननेकी प्रेरणा करते हैं।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ॥ १७ ॥
कर्मण: = कर्मोंका (तत्त्व) | बोद्धव्यम् = जानना चाहिये | कर्मण: = कर्मोंकी
अपि = भी | च = तथा | गति: = गति
बोद्धव्यम् = जानना चाहिये | विकर्मण: = विकर्मका (तत्त्व भी) | गहना = गहन है अर्थात्
च = और | बोद्धव्यम् = जानना चाहिये; | समझनेमें बड़ी
अकर्मण: = अकर्मका (तत्त्व भी) | हि = क्योंकि | कठिन है।
व्याख्या-'कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम्'-कर्म करते हुए
निर्लिप्त रहना ही कर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन
आगे अठारहवें श्लोकमें 'कर्मण्यकर्म य: पश्येत्' पदोंसे
किया गया है।
कर्म स्वरूपसे एक दीखनेपर भी अन्तःकरणके
भावके अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं-कर्म, अकर्म
और विकर्म। सकामभावसे की गयी शास्त्रविहित क्रिया
'कर्म' बन जाती है। फलेच्छा, ममता और आसक्तिसे
रहित होकर केवल दूसरोंके हितके लिये किया गया कर्म
'अकर्म' बन जाता है। विहित कर्म भी यदि दूसरेका अहित
करने अथवा उसे दुःख पहुँचानेके भावसे किया गया हो
तो वह भी 'विकर्म' बन जाता है। निषिद्ध कर्म तो
'विकर्म' है ही।
'अकर्मणश्च बोद्धव्यम्'-निर्लिप्त रहते हुए कर्म
करना ही अकर्मके तत्त्वको जानना है, जिसका वर्णन आगे
अठारहवें श्लोकमें 'अकर्मणि च कर्म य:' पदोंसे किया
गया है।
'बोद्धव्यं च विकर्मण:'-कामनासे कर्म होते हैं।
जब कामना अधिक बढ़ जाती है, तब विकर्म (पापकर्म)
होते हैं।
दूसरे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया
है कि अगर युद्ध-जैसा हिंसायुक्त घोर कर्म भी शास्त्रकी
आज्ञासे और समतापूर्वक (जय-पराजय, लाभ-हानि और
सुख-दु:खको समान समझकर) किया जाय, तो उससे
पाप नहीं लगता। तात्पर्य यह है कि समतापूर्वक कर्म
करनेसे दीखनेमें विकर्म होता हुआ भी वह 'अकर्म' हो
जाता है।
शास्त्रनिषिद्ध कर्मका नाम 'विकर्म' है। विकर्मके होनेमें