श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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इन तीन बातोंका दृढ़ निश्चय रहनेके कारण वह कर्म करते
हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है।
लोगोंमें प्राय: ऐसी मान्यता है कि कर्मयोगी गृहस्थ-
आश्रममें और ज्ञानयोगी (सांख्ययोगी) संन्यास-आश्रममें
रहता है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। जिसे शरीरसे
अपनी अलग सत्ताका स्पष्ट विवेक है, वह ज्ञानयोगी ही
है; चाहे वह गृहस्थ-आश्रममें हो अथवा संन्यास-आश्रममें।
जिसमें इतना विवेक नहीं है, पर उपर्युक्त तीन बातोंका
निश्चय पक्का है, वह कर्मयोगी ही है; चाहे वह गृहस्थ-
आश्रममें हो अथवा संन्यास-आश्रममें।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: ।
सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
जो कर्मयोगी फलकी इच्छाके बिना-
यदृच्छालाभसन्तुष्ट: = अपने-आप
जो कुछ मिल
जाय, उसमें सन्तुष्ट
रहता है (और)
विमत्सर: = (जो) ईर्ष्यासे रहित,
द्वन्द्वातीतः = द्वन्द्वोंसे रहित
(तथा)
सिद्धौ = सिद्धि
च = और
असिद्धौ = असिद्धिमें
सम: = सम है, (वह)
कृत्वा = (कर्म) करते हुए
अपि = भी (उससे)
न = नहीं
निबध्यते = बँधता।
व्याख्या—'यदृच्छालाभसन्तुष्ट:'—कर्मयोगी निष्काम-
भावपूर्वक सांगोपांग रीतिसे सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म करता है।
फल-प्राप्तिका उद्देश्य न रखकर कर्म करनेपर फलके
रूपमें उसे अनुकूलता या प्रतिकूलता, लाभ या हानि, मान
या अपमान, स्तुति या निन्दा आदि जो कुछ मिलता है,
उससे उसके अन्तःकरणमें कोई असन्तोष पैदा नहीं होता।
जैसे, वह व्यापार करता है तो उसे व्यापारमें लाभ हो
अथवा हानि, उसके अन्तःकरणपर उसका कोई असर नहीं
पड़ता। वह हरेक परिस्थितिमें समानरूपसे सन्तुष्ट रहता है;
क्योंकि उसके मनमें फलकी इच्छा नहीं होती। तात्पर्य यह
है कि व्यापारमें उसे लाभ-हानिका ज्ञान तो होता है तथा
वह उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी करता है, पर
परिणाममें वह सुखी-दु:खी नहीं होता। यदि साधकके
अन्तःकरणपर अनुकूलता-प्रतिकूलताका थोड़ा असर पड़
भी जाय, तो भी उसे घबराना नहीं चाहिये; क्योंकि
साधकके अन्तःकरणमें वह प्रभाव स्थायी नहीं रहता, शीघ्र
मिट जाता है।
उपर्युक्त पदोंमें आया 'लाभ' शब्द प्राप्तिके अर्थमें है,
जिसके अनुसार केवल लाभ या अनुकूलता मिलना ही
'लाभ' नहीं है, प्रत्युत लाभ-हानि, अनुकूलता-प्रतिकूलता
आदि जो कुछ प्राप्त हो जाय, वह सब 'लाभ' ही है।
'विमत्सर:'—कर्मयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी
एकता मानता है—'सर्वभूतभूतत्मा' (गीता ५।७)।
इसलिये उसका किसी भी प्राणीसे किंचिन्मात्र भी ईर्ष्याका
भाव नहीं रहता।
'विमत्सर:' पद अलगसे देनेका भाव यह है कि
अपनेमें किसी प्राणीके प्रति किंचिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव
न आ जाय, इस विषयमें कर्मयोगी बहुत सावधान रहता
है। कारण कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्रके
हितके लिये ही होती हैं; अतः यदि उसमें किंचिन्मात्र भी
ईर्ष्याका भाव होगा, तो उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ दूसरोंके
हितके लिये नहीं हो सकेंगी।
ईर्ष्या-दोष बहुत सूक्ष्म है। दो दुकानदार हैं और
आपसमें मित्रता रखते हैं। उनमें एककी दूकान दूसरेकी
अपेक्षा ज्यादा चल जाय, तो दूसरेमें थोड़ी ईर्ष्या पैदा हो
जायगी कि उसकी दूकान ज्यादा चल गयी, मेरी कम
चली। इस प्रकार ईर्ष्या-दोषके कारण मित्रसे भी मित्रकी
उन्नति नहीं सही जाती। जहाँ आपसमें प्रेम है, एकता है,
मित्रता है, वहाँ भी ईर्ष्या-दोष आ जाता है; फिर जहाँ वैर,
भिन्नता आदि हो, वहाँका तो कहना ही क्या है? इसलिये
साधकको इस दोषसे बचनेके लिये विशेष सावधान रहना
चाहिये।
'द्वन्द्वातीतः'—कर्मयोगी लाभ-हानि, मान-अपमान,
स्तुति-निन्दा, अनुकूलता-प्रतिकूलता, सुख-दु:ख आदि
द्वन्द्वोंसे अतीत होता है, इसलिये उसके अन्तःकरणमें
उन द्वन्द्वोंसे होनेवाले राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार
नहीं होते।
द्वन्द्व अनेक प्रकारके होते हैं; जैसे—भगवान्का सगुण-