भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक २४ ]

  • साधक-संजीवनी *

३२७

सत्रहवें श्लोकमें कहते हैं कि कर्म, विकर्म और अकर्म—तीनोंका तत्त्व जानना चाहिये। फिर अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने मुख्यरूपसे कर्मोंका तत्त्व (अकर्म अथवा निलिप्तता) बतलाया।

कामनासे 'कर्म' होते हैं, कामनाके बढ़नेपर 'विकर्म' होते हैं और कामनाका अत्यन्त अभाव होनेसे 'अकर्म' होता

है। मूलमें इस (सोलहवेंसे बत्तीसवें श्लोकतकके) प्रकरणका तात्पर्य 'अकर्म' का वर्णन करना ही है। इसीलिये भगवान्ने कर्म और विकर्म—दोनोंके मूल कारण 'कामना' के त्यागका तथा 'अकर्मोंका' वर्णन उन्नीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक प्रत्येक श्लोकमें किया है* और अन्तमें बत्तीसवें श्लोकमें इस प्रकरणका उपसंहार किया है।

परिशिष्ट भाव— एक 'क्रिया' होती है, एक 'कर्म' होता है और एक 'कर्मयोग' होता है। शरीर बालकसे जवान तथा जवानसे बूढ़ा होता है—यह 'क्रिया' है। क्रियासे न पाप होता है, न पुण्य; न बन्धन होता है, न मुक्ति। जैसे, गंगाजीका बहना क्रिया है; अतः कोई डूबकर मर जाय अथवा खेती आदि कोई परोपकार हो जाय तो गंगाजीको पाप-पुण्य नहीं लगता। जब मनुष्य क्रियासे सम्बन्ध जोड़कर कर्ता बन जाता है अर्थात् अपने लिये क्रिया करता है, तब वह क्रिया फलजनक 'कर्म' बन जाती है। कर्मसे बन्धन होता है—'यज्ञार्थार्त्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः' (गीता ३।९)। कर्मबन्धनसे छूटनेके लिये जब मनुष्य अपने लिये कुछ नहीं करता, प्रत्युत निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये ही कर्म करता है, तब वह 'कर्मयोग' हो जाता है। कर्मयोगसे बन्धन मिटता है—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते'। बन्धन मिटनेसे योग हो जाता है अर्थात् परमात्माके साथ नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जाता है। यह तेईसवाँ श्लोक कर्मयोगका मुख्य श्लोक है। जैसे भगवान्ने 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्मणि भस्मसात्कुरुते' (४।३७) पदोंसे ज्ञानाग्निके द्वारा ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण पाप भस्म होनेकी बात कही है और 'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि' (१८।६६) पदोंसे भक्तके सम्पूर्ण पाप नष्ट होनेकी बात कही है, ऐसे ही इस श्लोकमें 'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते' पदोंसे कर्मयोगीके समग्र कर्म (पाप) नष्ट होनेकी बात कही है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि यज्ञके लिये कर्म करनेसे सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। साधकोंकी रुचि, विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण साधन भी भिन्न-भिन्न प्रकारके होते हैं। इसलिये अब आगेके सात श्लोकोंमें (चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक) भगवान् भिन्न-भिन्न प्रकारके साधनोंका 'यज्ञ' रूपसे वर्णन करते हैं।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥

जिस यज्ञमें—

अर्पणम् = अर्पण अर्थात् जिससे अर्पण किया जाय, वे सुख, सुवा आदि पात्र (भी) | ब्रह्म = ब्रह्म है (और) ब्रह्मणा = ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्माग्नौ = ब्रह्मरूप अग्निमें हुतम् = आहुति देनारूप क्रिया (भी ब्रह्म है), ब्रह्मकर्मसमाधिना = (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस | मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्म-समाधि हो गयी है, तेन = उसके द्वारा गन्तव्यम् = प्राप्त करनेयोग्य (फल भी) ब्रह्म = ब्रह्म एव = ही है। ---|---|---

  • उदाहरणार्थ—कामनाके त्यागकी बात इन पदोंमें आयी है—'कामसङ्कल्पवर्जिताः' (४।११); 'त्यक्त्वा कर्मफलसंगम्' (४।२०); 'निराशीः' (४।२१); 'यदुच्छालाभसन्तुष्टः' (४।२२) और 'गतसंगस्य' (४।२३)।

अकर्मकी बात इन पदोंमें आयी है—'ज्ञानाग्निदधकर्मणिम्' (४।१९); 'नैव किंचित्करोति सः' (४।२०); 'कर्म कुर्वन्नान्मोति किल्विषम्' (४।२१); 'कृत्वापि न निबध्यते' (४।२२) और 'कर्म समग्रं प्रविलीयते' (४।२३)।