श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
[ चैकितान दुर्योधनके हाथसे मारे गये । ]
‘काशिराजश्च वीर्यवान्’—यह काशिराज बड़ा ही शूरवीर और महारथी है। यह भी पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा है। इसलिये आप सावधानीसे युद्ध करना; क्योंकि यह बड़ा पराक्रमी है।
[ काशिराज महाभारत-युद्धमें मारे गये । ]
‘पुरुजित्कुन्तिभोजश्च’—यद्यपि पुरुजित् और कुन्तिभोज—ये दोनों कुन्तीके भाई होनेसे हमारे और पाण्डवोंके मामा हैं, तथापि इनके मनमें पक्षपात होनेके कारण ये हमारे विपक्षमें युद्ध करनेके लिये खड़े हैं।
[ पुरुजित् और कुन्तिभोज—दोनों ही युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये । ]
‘शैब्यश्च नरपुद्गवः’—यह शैब्य युधिष्ठिरका श्वशुर है। यह मनुष्योंमें श्रेष्ठ और बहुत बलवान् है। परिवारके नाते यह भी हमारा सम्बन्धी है। परन्तु यह पाण्डवोंके ही पक्षमें खड़ा है।
‘युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्’—पांचालदेशके बड़े बलवान् और वीर योद्धा युधामन्यु तथा उत्तमौजा मेरे वैरी अर्जुनके रथके पहियोंकी रक्षामें नियुक्त किये गये हैं। आप इनकी ओर भी नजर रखना।
[ रातमें सोते हुए इन दोनोंको अश्वत्थामाने मार डाला । ]
‘सौभद्रः’—यह कृष्णकी बहन सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु है। यह बहुत शूरवीर है। इसने गर्भमें ही चक्रव्यूह-भेदनकी विद्या सीखी है। अतः चक्रव्यूह-रचनाके समय आप इसका खयाल रखें।
[ युद्धमें दुःशासनपुत्रके द्वारा अन्यायपूर्वक सिरपर गदाका प्रहार करनेसे अभिमन्यु मारे गये । ]
‘द्रौपदेयाश्च’—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—इन पाँचोंके द्वारा द्रौपदीके गर्भसे क्रमशः प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन पैदा हुए हैं। इन पाँचोंको आप देख लीजिये। द्रौपदीने भरी सभामें मेरी हँसी उड़ाकर मेरे हृदयको जलाया है, उसीके इन पाँचों पुत्रोंको युद्धमें मारकर आप उसका बदला चुकायें।
[ रातमें सोते हुए इन पाँचोंको अश्वत्थामाने मार डाला । ]
‘सर्व एव महारथाः’—ये सब-के-सब महारथी हैं। जो शास्त्र और शास्त्रविद्या—दोनोंमें प्रवीण हैं और युद्धमें अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धरी योद्धाओंका संचालन कर सकता है, उस वीर पुरुषको ‘महारथी’ कहते हैं*। ऐसे बहुत-से महारथी पाण्डव-सेनामें खड़े हैं।
सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करने और युद्धके लिये जोश दिलानेके लिये दुर्योधनने पाण्डव-सेनाकी विशेषता बतायी। दुर्योधनके मनमें विचार आया कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके पक्षपाती हैं ही; अतः वे पाण्डव-सेनाकी महत्ता सुनकर मेरेको यह कह सकते हैं कि जब पाण्डवोंकी सेनामें इतनी विशेषता है, तो उनके साथ तू सन्धि क्यों नहीं कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगेके तीन श्लोकोंमें अपनी सेनाकी विशेषता बताता है।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्जार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
| द्विजोत्तम | = हे द्विजोत्तम ! | तान् | = उनपर (भी आप) | मम | = मेरी |
|---|---|---|---|---|---|
| अस्माकम् | = हमारे पक्षमें | निबोध | = ध्यान दीजिये । | सैन्यस्य | = सेनाके (जो) |
| तु | = भी | ते | = आपको | नायकाः | = नायक हैं, |
| ये | = जो | सञ्जार्थम् | = याद दिलानेके लिये | तान् | = उनको (मैं) |
| विशिष्टाः | = मुख्य (हैं), | ब्रवीमि | = कहता हूँ। |
व्याख्या—‘अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम’—दुर्योधन द्रोणाचार्यसे कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ ! जैसे पाण्डवोंकी सेनामें श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी सेनामें भी उनसे कम विशेषतावाले महारथी नहीं हैं, प्रत्युत उनकी सेनाके महारथियोंकी अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता रखनेवाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये। तीसरे श्लोकमें ‘पश्य’ और यहाँ ‘निबोध’ क्रिया देनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये उसको देखनेके लिये दुर्योधन ‘पश्य’ (देखिये) क्रियाका प्रयोग करता है। परन्तु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात्
- एको दशसहस्राणि योधयेद् यस्तु ध्वनिनाम् । शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः ॥