भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक २५-२६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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रहता है और अन्तमें मर जाता है। इससे आगे विचार करें तो केवल उत्पत्ति और प्रलयका ही क्रम है, स्थिति वस्तुतः है ही नहीं; जैसे—यदि मनुष्यकी पूरी आयु पचास वर्षकी है, तो बीस वर्ष बीतनेपर उसकी आयु तीस वर्ष ही रह जाती है। इससे आगे विचार करें तो केवल प्रलय-ही-प्रलय (नाश-ही-नाश) है, उत्पत्ति है ही नहीं; जैसे—आयुके जितने वर्ष बीत गये, उतने वर्ष मनुष्य मर ही गया।

इस प्रकार मनुष्य प्रतिक्षण ही मर रहा है, उसका जीवन प्रतिक्षण ही मृत्युमें जा रहा है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदृश्यमें जा रहा है। प्रलय अभावका ही नाम है, इसलिये अभाव ही शेष रहा। अभावकी सत्ता भावरूप ब्रह्मपर ही टिकी हुई है। अतः भावरूपसे एक ब्रह्म ही शेष रहा—‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य ३।१४।१); ‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)।

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥

अपरे= अन्यपर्युपासते= अनुष्ठान करते हैंयज्ञके द्वारा
योगिनः= योगीलोग(और)एव
दैवम्= दैव
(भगवदर्पणरूप)अपरे= दूसरे (योगीलोग)यज्ञम्
यज्ञम्= यज्ञकाब्रह्माग्नौ= ब्रह्मरूपयज्ञका
एव= हीअग्निमेंउपजुह्वति
यज्ञेन= (विचाररूप)करते हैं।

व्याख्या—‘दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते’— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सर्वत्र ब्रह्मदर्शनरूप यज्ञ करनेवाले साधकका वर्णन किया। यहाँ भगवान् ‘अपरे’ पदसे उससे भिन्न प्रकारके यज्ञ करनेवाले साधकोंका वर्णन करते हैं।

यहाँ ‘योगिनः’ पद यज्ञार्थ कर्म करनेवाले निष्काम साधकोंके लिये आया है।

सम्पूर्ण क्रियाओं तथा पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर उन्हें केवल भगवान्का और भगवान्के लिये ही मानना ‘दैवयज्ञ’ अर्थात् भगवदर्पणरूप यज्ञ है। भगवान् देवोंके भी देव हैं, इसलिये सब कुछ उनके अर्पण कर देनेको ही यहाँ ‘दैवयज्ञ’ कहा गया है।

परिशिष्ट भाव—‘ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति’ का यह अर्थ भी ले सकते हैं—दूसरे योगीलोग संसाररूप ब्रह्मकी सेवाके लिये केवल लोकसंग्रहरूप यज्ञके लिये कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ करते हैं अर्थात् यज्ञार्थ कर्म करते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका नवों और चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।

शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥

अन्ये | = अन्य (योगीलोग) | संयमाग्निषु | = संयमरूप अग्नियोंमें | शब्दादीन् | = शब्दादि ---|---|---|---|---|--- श्रोत्रादीनि | = श्रोत्रादि | जुह्वति | = हवन किया करते हैं (और) | विषयान् | = विषयोंका इन्द्रियाणि | = समस्त इन्द्रियोंका | अन्ये | = दूसरे (योगीलोग) | इन्द्रियाग्निषु | = इन्द्रियरूप अग्नियोंमें | | | | जुह्वति | = हवन किया करते हैं।

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