भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ४ ]

कर्तव्य-पालन करनेके लिये बढ़िया सामग्री है। इसलिये प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितिको सहर्ष सहनेके समान दूसरा कोई तप नहीं है। भोगोंमें आसक्ति रहनेसे अनुकूलता अच्छी और प्रतिकूलता बुरी लगती है। इसी कारण प्रतिकूलताका महत्त्व समझमें नहीं आता।

‘योगयज्ञास्तथापे’ —यहाँ योग नाम अन्तःकरणकी समताका है। समताका अर्थ है—कार्यकी पूर्ति और अपूर्तिमें, फलकी प्राप्ति और अप्राप्तिमें, अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिमें, निन्दा और स्तुतिमें, आदर और निरादरमें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हलचल, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःखका न होना। इस तरह सम रहना ही ‘योगयज्ञ’ है।

‘स्वाध्यायज्ञानयज्ञः’ —केवल लोकहितके लिये गीता, रामायण, भागवत आदिका तथा वेद, उपनिषद् आदिका यथाधिकार मनन-विचारपूर्वक पठन-पाठन करना, अपनी वृत्तियोंका तथा जीवनका अध्ययन करना आदि सब स्वाध्यायरूप ‘ज्ञानयज्ञ’ है।

गीताके अन्तमें भगवान्ने कहा है कि जो इस गीता-शास्त्रका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा—ऐसा मेरा मत है (अठारहवें अध्यायका सत्तरवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि गीताका स्वाध्याय ‘ज्ञानयज्ञ’ है। गीताके भावोंमें गहरे उतरकर विचार करना, उसके भावोंको समझनेकी चेष्टा करना आदि सब स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ है।

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।

सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥

अपरे | = दूसरे (कितने ही) | रुद्ध्वा | = रोककर (कुम्भक करके) | प्राणान् | = प्राणोंका ---|---|---|---|---|--- प्राणायाम- | = प्राणायामके | प्राणे | = (फिर) प्राणमें | प्राणेषु | = प्राणोंमें परायणाः | परायण हुए (योगीलोग) | अपानम् | = अपानका | जुह्वति | = हवन किया करते हैं। अपाने | = अपानमें | जुह्वति | = हवन (रेचक) करते हैं; | एते | = ये प्राणम् | = प्राणका (पूरक करके) | तथा | = तथा | सर्वे, अपि | = सभी (साधक) प्राणापानगती | = प्राण और अपानकी गति | अपरे | = अन्य (कितने ही) | यज्ञक्षपित- | = यज्ञों द्वारा | | नियताहाराः | = नियमित आहार करनेवाले | कल्मषाः | पापोंका नाश करनेवाले (और) | | | | यज्ञविदः | = यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

व्याख्या—‘अपाने जुह्वति’.....‘प्राणायाम-परायणाः’ —प्राणका स्थान हृदय (ऊपर) तथा अपानका स्थान गुदा (नीचे) हैं। श्वासको बाहर निकालते समय वायुकी गति ऊपरकी ओर तथा श्वासको भीतर ले जाते समय वायुकी गति नीचेकी ओर होती है। इसलिये श्वासको बाहर निकालना ‘प्राण’ का कार्य और श्वासको भीतर ले जाना ‘अपान’ का कार्य है। योगीलोग पहले

बाहरकी वायुको बायीं नासिका-(चन्द्रनाड़ी-) के द्वारा भीतर ले जाते हैं। वह वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुको साथ लेकर नाभिसे होती हुई स्वाभाविक ही अपानमें लीन हो जाती है। इसको ‘पूरक’ कहते हैं। फिर वे प्राणवायु और अपानवायु—दोनोंकी गति रोक देते हैं। न तो श्वास बाहर जाता है और न श्वास भीतर ही आता है। इसको ‘कुम्भक’ कहते हैं। इसके बाद वे भीतरकी वायुको दायीं नासिका-

१-इस (उन्तीसवें) श्लोकमें ‘अपरे’ कर्ता और ‘जुह्वति’ क्रिया एक ही आयी है; अतः यहाँ पूरक, कुम्भक और रेचकपूर्वक किया जानेवाला एक ही प्राणायामरूप यज्ञ लिया गया है।

२-हृदि प्राणः स्थितो नियमपानो गुदमण्डले। (योगचूडामण्युपनिषद् २३)