श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
कि जो ज्ञान इतनी दुर्लभतासे, ज्ञानियोंके पास रहकर उनकी सेवा करके और विनयपूर्वक प्रश्नोत्तर करके तथा उसके अनुसार श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके प्राप्त करेगा, वही ज्ञान तुझे कर्मयोगकी विधिसे प्राप्त कर्तव्य-(युद्ध-) का पालन करनेसे ही प्राप्त हो जायगा। जिस तत्त्वज्ञानके लिये मैंने तत्त्वदर्शी महापुरुषोंके पास जानेकी प्रेरणा की है, वह तत्त्वज्ञान प्राप्त हो ही जायगा, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि जिस पुरुषके पास जाओगे, वह तत्त्वदर्शी ही है—इसका क्या पता? और उस महापुरुषके प्रति श्रद्धाकी कमी भी रह सकती है। दूसरी बात, इस प्रक्रियामें पहले सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें देखेगा और उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंको एक परमात्मतत्त्वमें देखेगा (गीता—चौथे
परिशिष्ट भाव—‘पवित्रमिह’ —अपवित्रता संसारके अभाव हो जाता है, तब अपवित्रता रहनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसलिये ज्ञानमें किंचिन्मात्र भी अपवित्रता, जड़ता, विकार नहीं है।
‘इह’ पद ‘लोक’ का वाचक है। तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञान लौकिक है, जबकि परमात्मज्ञान अलौकिक है।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें ज्ञान-प्राप्तिके पात्रका निरूपण करते हैं।
श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
संयतेन्द्रियः | = (जो) जितेन्द्रिय (तथा) | ज्ञानम् | = ज्ञानको | अचिरेण | = तत्काल ---|---|---|---|---|--- तत्परः | = साधन-परायण है, (ऐसा) | लभते | = प्राप्त होता है (और) | पराम् | = परम श्रद्धावान् | = श्रद्धावान् मनुष्य | ज्ञानम् | = ज्ञानको | शान्तिम् | = शान्तिको | | लब्ध्वा | = प्राप्त होकर (वह) | अधिगच्छति | = प्राप्त हो जाता है।
व्याख्या—‘तत्परः संयतेन्द्रियः’ —इस श्लोकमें श्रद्धावान् पुरुषको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयी है। अपनेमें श्रद्धा कम होनेपर भी मनुष्य भूलसे अपनेको अधिक श्रद्धावाला मान सकता है, इसलिये भगवान्ने श्रद्धाकी पहचानके लिये दो विशेषण दिये हैं—‘संयतेन्द्रियः’ और ‘तत्परः’। जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया वशमें हैं, वह ‘संयतेन्द्रियः’ है और जो अपने साधनमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ है, वह ‘तत्परः’ है। साधनमें तत्परताकी कसीटी है—इन्द्रियोंका संयत होना। अगर इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और विषयभोगोंकी तरफ जाती हैं, तो साधन-परायणतामें कमी समझनी चाहिये।
‘श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्’ —परमात्मामें, महापुरुषोंमें, धर्ममें और शास्त्रोंमें प्रत्यक्षकी तरह आदरपूर्वक विश्वास
अध्यायका पैँतीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त करनेकी इस प्रक्रियामें संशय तथा विलम्बकी सम्भावना है। परन्तु कर्मयोगके द्वारा अन्य पुरुषकी अपेक्षाके बिना, अवश्यमेव और तत्काल उस तत्त्वज्ञानका अनुभव हो जाता है। इसलिये मैं तेरे लिये कर्मयोगको ही ठीक समझता हूँ; अतः तुझे प्रचलित प्रणालीके ज्ञानका उपदेश मैं नहीं दूँगा।
भगवान् तो महापुरुषोंके भी महापुरुष हैं। अतः वे अर्जुनको किसी दूसरे महापुरुषके पास जाकर ज्ञान सीखनेके लिये कैसे कह सकते हैं? आगे इसी अध्यायके इकतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगकी प्रशंसा करके बयालीसवें श्लोकमें अर्जुनको समतामें स्थित होकर युद्ध करनेकी स्पष्टरूपसे आज्ञा दी है।
सम्बन्धसे आती है। तत्त्वज्ञान होनेपर जब संसारका अत्यन्त
होना ‘श्रद्धा’ कहलाती है।
जबतक परमात्मतत्त्वका अनुभव न हो, तबतक
परमात्मामें प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होना चाहिये।
वास्तवमें परमात्मासे देश, काल आदिकी दूरी नहीं है,
केवल मानी हुई दूरी है। दूरी माननेके कारण ही परमात्मा
सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी अनुभवमें नहीं आ रहे हैं।
इसलिये ‘परमात्मा अपनेमें है’ ऐसा मान लेनेका नाम ही
श्रद्धा है। कैसा ही व्यक्ति क्यों न हो, अगर वह एकमात्र
परमात्माको प्राप्त करना चाहता है और ‘परमात्मा अपनेमें
है’ ऐसी श्रद्धावाला है, तो उसे अवश्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।
संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है, एक क्षण भी टिकता
हो जाता है।