श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ४ ]
रहेगी, ऐसी वस्तुकी प्रतीति तो होती है, पर प्राप्त नहीं होती। प्रतीत होनेवाली वस्तुको प्राप्त मान लेना अपने विवेकका सर्वथा अनादर है।
जो संसारकी उत्पत्तिके पहले भी रहता है, संसारकी (उत्पन्न होकर होनेवाली) स्थितिमें भी रहता है और संसारके नष्ट होनेके बाद भी रहता है, वह तत्त्व 'है' नामसे कहा जाता है, और 'है' की प्राप्तिको ही 'लभते' कहते हैं। परन्तु जो वस्तु उत्पन्न होनेसे पहले भी नहीं थी और नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहेगी तथा बीचमें भी निरन्तर नाशकी ओर जा रही है, वह वस्तु 'नहीं' नामसे कही जाती है। 'नहीं' की प्रतीति होती है, प्राप्ति नहीं। जो 'है', वह तो है ही और जो 'नहीं', वह है ही नहीं। 'नहीं' को 'नहीं'-रूपसे मानते हुए 'है' को 'है'-रूपसे मान लेना श्रद्धा है, जिससे नित्यसिद्ध ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है—'श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्'।
'ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति'—नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने निषेध-मुखसे कहा है
परिशिष्ट भाव— 'श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानम्'—श्रद्धा-विश्वास और विवेककी आवश्यकता सभी साधकोंके लिये हैं। हाँ, कर्मयोग तथा ज्ञानयोगमें विवेककी मुख्यता है और भक्तियोगमें श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता है। आरम्भमें 'तत्त्वज्ञान है'—ऐसी श्रद्धा होगी, तभी साधक उसकी प्राप्तिके लिये साधन करेगा।
सम्बन्ध— जो ज्ञानप्राप्तिका अपात्र है, ऐसे विवेकहीन संशयात्मा मनुष्यकी भगवान् आगेके श्लोकमें निन्दा करते हैं।
अज्ञश्चाश्रद्धातनश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
| अज्ञः | = विवेकहीन | संशयात्मनः | = संशयात्मा | न | = न |
|---|---|---|---|---|---|
| च | = और | मनुष्यके लिये | परः | = परलोक | |
| अश्रद्धातनः | = श्रद्धारहित | न | = न तो | (हितकारक) है | |
| संशयात्मा | = संशयात्मा मनुष्यका | अयम् | = यह | च | = और |
| विनश्यति | = पतन हो जाता है। | लोकः | = लोक (हितकारक) | न | = न |
| (ऐसे) | अस्ति | = है | सुखम् | = सुख (ही) है। |
व्याख्या— 'अज्ञश्चाश्रद्धातनश्च संशयात्मा विनश्यति'—जिस पुरुषका विवेक अभी जाग्रत् नहीं हुआ है तथा जितना विवेक जाग्रत् हुआ है, उसको महत्त्व नहीं देता और साथ ही जो अश्रद्धालु है, ऐसे संशययुक्त पुरुषका पारमार्थिक मार्गसे पतन हो जाता है। कारण कि संशययुक्त पुरुषकी अपनी बुद्धि तो प्राकृत—शिक्षारहित है और दूसरेकी बातका आदर नहीं करता, फिर ऐसे पुरुषके संशय कैसे नष्ट हो सकते हैं? और
कि श्रद्धारहित पुरुष मेरेको प्राप्त न होकर जन्म-मरणरूप संसार-चक्रमें घूमते रहते हैं। उसी बातको यहाँ विधि-मुखसे कहते हैं कि श्रद्धावान् पुरुष परमशान्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् मेरेको प्राप्त होकर जन्म-मरणरूप संसार चक्रसे छूट जाता है।
परमशान्तिका तत्काल अनुभव न होनेका कारण है—जो वस्तु अपने-आपमें है, उसको अपने-आपमें न दूँदकर बाहर दूसरी जगह दूँदना। परमशान्ति प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। परन्तु मनुष्य परमशान्ति-स्वरूप परमात्मासे तो विमुख हो जाता है और सांसारिक वस्तुओंमें शान्ति दूँदता है। इसलिये अनेक जन्मोंतक शान्तिकी खोजमें भटकते रहनेपर भी उसे शान्ति नहीं मिलती। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंमें शान्ति मिल ही कैसे सकती है? तत्त्वज्ञानका अनुभव होनेपर जब दुःखरूप संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब स्वतःसिद्ध परमशान्तिका तत्काल अनुभव हो जाता है।
संशय नष्ट हुए बिना उसकी उन्नति भी कैसे हो सकती है?
अलग-अलग बातोंको सुननेसे 'यह ठीक है अथवा वह ठीक है?'—इस प्रकार सन्देहयुक्त पुरुषका नाम संशयात्मा है। पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले साधकमें संशय पैदा होना स्वाभाविक है; क्योंकि वह किसी भी विषयको पढ़ेगा तो कुछ समझेगा और कुछ नहीं समझेगा। जिस विषयको कुछ नहीं समझते, उस विषयमें संशय पैदा