श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने चौथे अध्यायके तैत्तिरीसर्वे सौत्तीसर्वे श्लोकतक कर्म तथा पदार्थोक्ता स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीकी प्रशंसा की और इसके लिये (चौथे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें) अर्जुनको आज्ञा दी। तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी इस प्रणालीमें कर्मोक्ता स्वरूपसे त्याग करके एकात्ममें परमात्मतत्त्वका मनन करना आवश्यक है। अर्जुनके मनमें पहले ही युद्धरूप कर्म न करनेका भाव था; क्योंकि वे अपना कल्याण चाहते थे और युद्धको पाप समझते थे। अतः अर्जुनने समझा कि भगवान् मेरे लिये इस प्रकार कर्मोक्ता स्वरूपसे त्याग करके ज्ञान-प्राप्तिके लिये साधन करनेको कहते हैं।
फिर चौथे अध्यायके ही अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि उसी तत्त्वज्ञानको साधक कर्मयोगके द्वारा अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें प्राप्त कर लेता है। भाव यह है कि कर्मयोगके साधकको ज्ञान-प्राप्तिके लिये दूसरे साधनोंकी तथा तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर निवास करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इससे स्पष्ट ही तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिमें कर्मयोगकी विशेषरूपसे प्रशंसा हुई है।
इस प्रकार अर्जुनने चौथे अध्यायके तैत्तिरीसर्वे श्लोकमें ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीकी प्रशंसा सुनी और चौंतीसवें श्लोकमें 'विद्धि' पदसे उस प्रणालीसे ज्ञान प्राप्त करनेकी अपने लिये विशेष आज्ञा मानी। फिर अड़तीसवें और इकतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगकी प्रशंसा सुनी। बयालीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको 'योगमातिष्ठोत्तिष्ठ' पदसे कर्मयोगकी विधिसे युद्ध करनेकी आज्ञा दी। इस तरह ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंकी प्रशंसा सुनकर तथा दोनोंके लिये आज्ञा प्राप्त होनेपर अर्जुन यह निर्णय नहीं कर सके कि इन दोनोंमें कौन-सा साधन मेरे लिये श्रेष्ठ है। अतः इसका निर्णय भगवान्से करानेके उद्देश्यसे अर्जुन प्रश्न करते हैं।
अर्जुन उवाच
सन्त्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
अर्जुन बोले—
| कृष्ण | = हे कृष्ण! (आप) | योगम् | = कर्मयोगकी | सुनिश्चितम् | = निश्चितरूपसे |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्मणाम् | = कर्मोक्ता | शंससि | = प्रशंसा करते हैं। | ||
| (अतः) | श्रेयः | = कल्याणकारक | |||
| हो, | |||||
| सन्त्यासम् | = स्वरूपसे त्याग | ||||
| करनेकी | एतयोः | = इन दोनों साधनोंमें | तत् | = उसको | |
| च | = और | यत् | = जो | मे | = मेरे लिये |
| पुनः | = फिर | एकम् | = एक | ब्रूहि | = कहिये। |