भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 356

श्लोक २ ] * साधक-संजीवनी * ३५५

लेनेको तैयार हूँ। आगे दूसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें

भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरे तो दोनों हाथोंमें लड्डू

हैं; यदि युद्धमें तू मारा गया तो तुझे स्वर्ग मिलेगा और जीत

गया तो राज्य मिलेगा। यदि अर्जुनके मनमें स्वर्ग और

संसारके राज्यकी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं होती तो भगवान्

शायद ही ऐसा कहते। अतः अर्जुनके हृदयमें प्रतीत होनेवाला

वैराग्य वास्तविक नहीं है। परन्तु उनमें अपने कल्याणकी

इच्छा है, जो इस श्लोकमें भी दिखायी दे रही है।

सम्बन्ध—अब भगवान् अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥

श्रीभगवान् बोले—

सन्न्यासः = सन्न्यास (सांख्ययोग)

निःश्रेयसकरौ = कल्याण करनेवाले हैं।

कर्मसन्न्यासात् = कर्मसन्न्यास (सांख्य-योग)-से

च = और

तु = परन्तु

कर्मयोगः = कर्मयोग

तयोः = उन दोनोंमें (भी)

कर्मयोगः = कर्मयोग

उभौ = दोनों ही

विशिष्यते = श्रेष्ठ है।

व्याख्या—[ भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार सांख्ययोग

और कर्मयोगका पालन प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय

आदिके मनुष्य कर सकते हैं। कारण कि उनका सिद्धान्त

किसी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिको लेकर नहीं है। इसी

अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका त्याग करके

विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीको 'कर्मसन्न्यास'

नामसे कहा है। परन्तु भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार ज्ञान-

प्राप्तिके लिये सांख्ययोगका पालन प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्रतासे

कर सकता है और उसका पालन करनेमें कर्मोंका स्वरूपसे

त्याग करनेकी आवश्यकता भी नहीं है। इसलिये भगवान्

प्रचलित मतका भी आदर करते हुए अपने सिद्धान्तके

अनुसार अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।]

'सन्न्यासः'—यहाँ 'सन्न्यासः' पदका अर्थ 'सांख्य-

योग' है, कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं। अर्जुनके प्रश्नका

उत्तर देते हुए भगवान् कर्मोंके त्यागपूर्वक सन्न्यासका

विवेचन न करके कर्म करते हुए ज्ञानको प्राप्त करनेका

जो सांख्ययोगका मार्ग है, उसका विवेचन करते हैं। उस

सांख्ययोगके द्वारा मनुष्य प्रत्येक वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय

आदिमें रहते हुए प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक ज्ञान

प्राप्त कर सकता है अर्थात् अपना कल्याण कर सकता है।

सांख्ययोगकी साधनामें विवेक-विचारकी मुख्यता रहती

है। विवेकपूर्वक तीव्र वैराग्यके बिना यह साधना सफल

नहीं होती। इस साधनामें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव

होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वपर दृष्टि रहती है। राग मिटे

बिना संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन

है। इसलिये भगवान्ने देहाभिमानियोंके लिये यह साधन

क्लेशयुक्त बताया है (गीता—बारहवें अध्यायका पाँचवाँ

श्लोक)। इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भी भगवान्ने कहा

है कि कर्मयोगका साधन किये बिना सन्न्यासका साधन होना

कठिन है; क्योंकि संसारसे राग हटानेके लिये कर्मयोग ही

सुगम उपाय है।

'कर्मयोगश्च'—मानवमात्रमें कर्म करनेका राग

अनादिकालसे चला आ रहा है, जिसे मिटानेके लिये कर्म

करना आवश्यक है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा

श्लोक)। परन्तु वे कर्म किस भाव और उद्देश्यसे कैसे

किये जायँ कि करनेका राग सर्वथा मिट जाय, उस

कर्तव्य-कर्मको करनेकी कलाको 'कर्मयोग' कहते हैं।

कर्मयोगमें कार्य छोटा है या बड़ा, इसपर दृष्टि नहीं रहती।

जो भी कर्तव्य-कर्म सामने आ जाय, उसीको निष्कामभावसे

दूसरोंके हितके लिये करना है। कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद

करनेके लिये यह आवश्यक है कि कर्म अपने लिये न

किये जायँ। अपने लिये कर्म न करनेका अर्थ है—कर्मोंके

बदलेमें अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा न होना।

जबतक अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा रहती है,

तबतक कर्मोंके साथ सम्बन्ध बना रहता है।

'निःश्रेयसकरावुभौ'—अर्जुनका प्रश्न था कि

सांख्ययोग और कर्मयोग—इन दोनों साधनोंमें कौन-सा

साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाला है? उत्तरमें