श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ५ ]
| बालाः | = बेसमझ लोग | न | = न कि | सम्यक् | = अच्छी तरहसे |
|---|---|---|---|---|---|
| साङ्ख्ययोगी | = सांख्ययोग और | ||||
| कर्मयोगको | पण्डिताः | = पण्डितजन; | |||
| (क्योंकि) | आस्थितः | = स्थित (मनुष्य) | |||
| पृथक् | = अलग-अलग | ||||
| (फलवाले) | एकम् | = (इन दोनोंमेंसे) | |||
| एक साधनमें | उभयोः | = दोनोंके | |||
| प्रवदन्ति | = कहते हैं, | अपि | = भी | फलम् | = फलरूप |
| (परमात्माको) | |||||
| विन्दते | = प्राप्त कर लेता है। |
व्याख्या —‘साङ्ख्ययोगी पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः’—इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्माका स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेके साधनको ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कहा है। भगवान्ने भी दूसरे श्लोकमें अपने सिद्धान्तकी मुख्यता रखते हुए उसे ‘संन्यास’ और ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कहा है। अब उस साधनको भगवान् यहाँ ‘सांख्य’ नामसे कहते हैं। भगवान् शरीर-शरीरीके भेदका विचार करके स्वरूपमें स्थित होनेको ‘सांख्य’ कहते हैं। भगवान्के मतमें ‘संन्यास’ और ‘सांख्य’ पर्यायवाची हैं, जिसमें कर्माका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है।
अर्जुन जिसे ‘कर्मसंन्यास’ नामसे कह रहे हैं, वह भी निःसन्देह भगवान्के द्वारा कहे ‘सांख्य’ का ही एक अवान्तर भेद है। कारण कि गुरुसे सुनकर भी साधक शरीर-शरीरीके भेदका ही विचार करता है।
‘बालाः’ पदसे भगवान् यह कहते हैं कि आयु और बुद्धिमें बड़े होकर भी जो सांख्ययोग और कर्मयोगको अलग-अलग फलवाले मानते हैं, वे बालक अर्थात् बेसमझ ही हैं।
परिशिष्ट भाव —जो अन्य शास्त्रीय बातोंको तो जानता है, पर सांख्ययोग और कर्मयोगके तत्त्वको गहराईसे नहीं जानता, वह वास्तवमें बालक अर्थात् बेसमझ है।
गीताभरमें अविनाशी तत्त्वके लिये ‘फल’ शब्द इसी श्लोकमें आया है। ‘फल’ शब्दका अर्थ है—परिणाम। कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों साधनोंसे प्राप्त होनेवाले तत्त्वको ‘फल’ कहनेका तात्पर्य है कि इन दोनों साधनोंमें मनुष्यका अपना उद्योग मुख्य है। ज्ञानयोगमें विवेकरूप उद्योग मुख्य है और कर्मयोगमें परहितकी क्रियारूप उद्योग मुख्य है। साधकका अपना उद्योग, परिश्रम सफल हो गया, इसलिये इसको ‘फल’ कहा गया है। यह फल नष्ट होनेवाला नहीं है। कर्मयोग तथा ज्ञानयोग—दोनोंका फल आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान है।
कर्तव्य-कर्म करना कर्मयोग है और कुछ न करना ज्ञानयोग है। कुछ न करनेसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती है, उसी तत्त्वकी प्राप्ति कर्तव्य-कर्म करनेसे हो जाती है। ‘करना’ और ‘न करना’ तो साधन हैं और इनसे जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती है, वह साध्य है।
**यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥**