श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
३१३
सकता; जैसे—कोई राजा या विद्वान् किसी दूसरेपर विजय प्राप्त करना चाहता है तो उसे सबसे पहले अपनी सेना, सामर्थ्य, बुद्धि, विद्या आदिका सहारा लेना ही पड़ता है।
कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य पराधीन हो जाता है। यह पराधीनता कामनाकी पूर्ति न होनेपर अथवा पूर्ति होनेपर—दोनों ही अवस्थाओंमें ज्यों-की-त्यों रहती है। कामनाकी पूर्ति न होनेपर मनुष्य वस्तुके अभावके कारण पराधीनताका अनुभव करता है और कामनाकी पूर्ति होनेपर अर्थात् वस्तुके मिलनेपर वह उस वस्तुके पराधीन हो जाता है; क्योंकि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुमात्र 'पर' है। कामनाकी पूर्ति न होनेपर तो मनुष्यको पराधीनताका अनुभव होता है, पर कामनाकी पूर्ति होनेपर बुद्धिमें ऐसा अंधेरा छा जाता है कि पराधीन रहते हुए भी मनुष्यको पराधीनताका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत स्वाधीनताका अनुभव होता है!
ज्ञानी महापुरुषमें कामनाका सर्वथा अभाव होनेसे वह पूर्णतः स्वाधीन हो जाता है। स्वाधीन पुरुष ही विजयी होता है। परन्तु स्वाधीन पुरुषके मनमें कभी किसीको पराजित करनेका भाव नहीं आता। वह संसारकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकताका अनुभव नहीं करता, प्रत्युत संसार ही उसकी आवश्यकताका अनुभव करता है।
जिसने संसारको जीत लिया है, ऐसे समदर्शी महापुरुषको संसारका बड़ा-से-बड़ा सुख (प्रलोभन) भी आकृष्ट नहीं कर सकता और बड़ा-से-बड़ा दुःख भी विचलित नहीं कर सकता (गीता—छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।
उसके मनमें संसारके किसी भी प्राणी, पदार्थ, परिस्थिति आदिकी किंचिन्मात्र भी कामना, वासना, स्मृहा, तृष्णा आदि नहीं रहती। यद्यपि उसे अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान होता है तथा उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी होती है, तथापि अनुकूलता-प्रतिकूलताका उसके अन्तःकरणपर कोई असर नहीं पड़ता।
'निर्दोषं हि समं ब्रह्म'—परमात्मतत्त्वमें दोष, विकार या विषमता है ही नहीं। जितने भी दोष या विषमताएँ आती हैं, वे सब प्रकृतिसे रागपूर्वक सम्बन्ध माननेसे ही आती हैं। परमात्मतत्त्व प्रकृतिके सम्बन्धसे सर्वथा निर्लिप्त है, इसलिये उसमें किंचिन्मात्र भी दोष या विषमता नहीं है।
'तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः'—परमात्मतत्त्व निर्दोष
होता, प्रत्युत बुद्धि ही स्थित होती है। मन ध्यानमें स्थित होता
और सम है, इसलिये जिन महापुरुषोंका अन्तःकरण निर्दोष और सम हो गया है, वे परमात्मतत्त्वमें ही स्थित हैं।
असत्के संगसे ही सम्पूर्ण दोषों और विषमताओंकी उत्पत्ति होती है। संसार असत् है। असत् उसे कहते हैं, जो प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मूलमें जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। असत्से सम्बन्ध (तादात्म्य) रहते हुए दोषों और विषमताओंसे बचना असम्भव है। महापुरुषोंके अन्तःकरणमें असत्का महत्त्व न रहनेसे उनपर असत्का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। असत्का कोई प्रभाव न पड़नेसे उनका अन्तःकरण निर्दोष और सम हो जाता है। निर्दोष और सम होनेसे उनकी परमात्मतत्त्वमें स्वतः-स्वाभाविक स्थिति हो जाती है, जो कि पहलेसे ही है। जैसे जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि अवश्य है; क्योंकि अग्निके बिना धुआँ सम्भव ही नहीं, ऐसे ही जिनके अन्तःकरणमें समता है, वे अवश्य ही परमात्मतत्त्वमें स्थित हैं; क्योंकि परमात्मतत्त्वमें स्थिति हुए बिना पूर्ण समता आनी सम्भव ही नहीं।
अपनी (स्वयंकी) स्थिति परमात्मतत्त्वमें अथवा समतामें होनेके कारण ही अन्तःकरणमें समता आती है। इसलिये अन्तःकरणमें समता आनेपर ही उन महापुरुषोंकी यह पहचान होती है कि वे परमात्मतत्त्वमें अथवा समतामें स्थित हैं। इसी समताको गीताने 'योग' कहा है—'समत्वं योग उच्यते' (२।४८), और इसकी प्राप्तिको ही गीता मनुष्य-जन्मकी पूर्णता मानती है।
ज्ञानयोगका यह प्रकरण तेरहवें श्लोकसे चला है। पंद्रहवें श्लोकके अन्तमें आये 'जन्तवः' पदसे बहुवचनका प्रयोग आरम्भ हुआ है, जो इस उन्नीसवें श्लोकतक चला है। सबमें बहुवचन आनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य मोहित हो रहे थे, वे सब-के-सब परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु प्रस्तुत श्लोकमें 'ब्रह्मणि' पदमें एकवचन आया है, जिसका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण मनुष्योंको एक ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। मुक्ति चाहे ब्राह्मणकी हो अथवा चाण्डालकी, दोनोंको एक ही तत्त्वकी प्राप्ति होती है। भेद केवल शरीरोंको लेकर है, जो उपादेय है। तत्त्वको लेकर कोई भेद नहीं है। पहले जितने सनकादिक महात्मा हुए हैं, उनको जो तत्त्व प्राप्त हुआ है, वही तत्त्व आज भी प्राप्त होता है।
वाचक समझना चाहिये; क्योंकि समतामें मन स्थित नहीं है। यह प्रकरण भी स्थिरबुद्धिका है। मनकी स्थिरता केवल