श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
३९५
विकल्प, सन्देह, विपरीत भावना, असम्भावना आदि होती ही नहीं। इसलिये उसे 'स्थिरबुद्धिः' कहा गया है।
'असम्भूहः'—जो परमात्मतत्त्व सदा-सर्वत्र विद्यमान है, उसका अनुभव न होना और जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, उस उत्पत्ति-विनाशशील संसारको सत्य मानना—ऐसी मूढ़ता साधारण मनुष्यमें रहती है। इस मूढ़ताका जिसमें सर्वथा अभाव हो गया है, उसे ही यहाँ 'असम्भूहः' कहा गया है।
'ब्रह्मवित्'—परमात्मासे अलग होकर परमात्माका अनुभव नहीं होता। परमात्माका अनुभव होनेमें अनुभविता, अनुभव और अनुभाव्य—यह त्रिपुटी नहीं रहती, प्रत्युत त्रिपुटीरहित अनुभवमात्र (ज्ञानमात्र) रहता है। वास्तवमें ब्रह्मको जाननेवाला कौन है—यह बताया नहीं जा सकता। कारण कि ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मसे अभिन्न हो जाता है*, इसलिये वह अपनेको ब्रह्मवित् मानता ही नहीं अर्थात् उसमें 'मैं ब्रह्मको जानता हूँ' ऐसा अभिमान नहीं रहता।
परिशिष्ट भाव— सुषुप्त और मूच्छाओं मनुष्यका शरीरसे अज्ञानपूर्वक सम्बन्ध-विच्छेद होता है अर्थात् मन अविद्यामें लीन होता है; अतः इन अवस्थाओंमें मनुष्यको प्रिय और अप्रियका, शारीरिक पीड़ा आदिका ज्ञान ही नहीं होता। परन्तु जीवनमुक्त महापुरुषका शरीरसे ज्ञानपूर्वक सम्बन्ध-विच्छेद होता है। इसलिये उसको प्रिय और अप्रियका, शरीरकी पीड़ा आदिका ज्ञान तो होता है, पर उनसे वह हर्षित-उद्विग्न, सुखी-दुःखी नहीं होता। उसकी शरीर-इन्द्रियां-मन-बुद्धिकी परवशता मिट जाती है।
ब्रह्मको जानना और उसमें स्थित होना—दोनों एक ही हैं।
सम्बन्ध—ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव किस प्रकार होता है, इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।
बाह्यस्पर्शेष्बसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥
बाह्यस्पर्शेषु | = बाह्यस्पर्श (प्राकृत वस्तुमात्रके सम्बन्ध) में | आत्मनि | = अन्तःकरणमें | ब्रह्मयोगयुक्तात्मा | = ब्रह्ममें ---|---|---|---|---|--- असक्तात्मा | = आसक्तिरहित | यत् | = जो | | अभिन्नभावसे | अन्तःकरणवाला | सुखम् | = (सात्त्विक) सुख है, (उसको) | | स्थित मनुष्य | साधक | विन्दति | = प्राप्त होता है। (फिर) | अक्षयम् | = अक्षय | | सः | = वह | सुखम् | = सुखका | | | | अश्नुते | = अनुभव करता है।
व्याख्या— 'बाह्यस्पर्शेष्बसक्तात्मा'—परमात्माके अतिरिक्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदिमें तथा शब्द, स्पर्श आदि विषयोंके संयोगजन्य सुखमें जिसकी आसक्ति मिट गयी है, ऐसे साधकके लिये यहाँ ये पद
प्रयुक्त हुए हैं। जिन साधकोंकी आसक्ति अभी मिटी नहीं है, पर जिनका उद्देश्य आसक्तिको मिटानेका हो गया है, उन साधकोंको भी आसक्तिरहित मान लेना चाहिये। कारण कि उद्देश्यकी दृढ़ताके कारण वे भी शीघ्र ही आसक्तिसे
- 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्डक० ३।२।९); 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' (बृहदारण्यक० ४।४।६)