श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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परमात्मतत्त्वसे सर्वथा एक हुए बिना अपनी सत्ता, अपने
व्यक्तित्व (परिच्छिन्नता या एकदेशीयता) का सर्वथा
अभाव नहीं होता।
'सुखमक्षयमश्नुते' - जबतक साधक सात्त्विक सुखका
उपभोग करता रहता है, तबतक उसमें सूक्ष्म 'अहम्',
सूक्ष्म परिच्छिन्नता रहती है। सात्त्विक सुखका भी उपभोग
न करनेसे 'अहम्' का सर्वथा अभाव हो जाता है और
साधकको परमात्मस्वरूप, चिन्मय और नित्य एकरस
रहनेवाले अविनाशी सुखका अनुभव हो जाता है। इसी
अक्षय सुखको 'आत्यन्तिक सुख' (छठे अध्यायका इक्कीसवाँ
श्लोक), 'अत्यन्त-सुख' (छठे अध्यायका अट्ठाईसवाँ
श्लोक), 'ऐकान्तिक सुख' (चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ
श्लोक) आदि नामोंसे कहा गया है। इसका अनुभव होनेपर
उस परमात्मतत्त्वमें स्वाभाविक ही एक आकर्षण होता है,
जिसे प्रेम कहते हैं (गीता- अठारहवें अध्यायका चौवनवाँ
श्लोक)। इस प्रेममें कभी कमी नहीं आती, प्रत्युत यह
उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहता है। उस तत्त्वका प्रसंग चलनेपर,
उसपर विचार करनेपर पहलेसे कुछ नयापन दीखता है-
यही प्रेमका प्रतिक्षण बढ़ना है। इसमें एक समझनेकी बात
यह है कि प्रेमके प्रतिक्षण बढ़नेपर भी यदि 'पहले कमी
थी और अब पूर्ति हो गयी' ऐसा प्रतीत होता है, तो यह
साधन-अवस्था है, यदि नयापन दीखनेपर भी 'पहले कमी
थी और अब पूर्ति हो गयी' ऐसा प्रतीत नहीं होता, तो
यह सिद्ध-अवस्था है।
सम्बन्ध-पूर्वश्लोकमें भगवान्ने विषयोंसे विरक्त पुरुषको अक्षय सुखकी प्राप्ति बतायी। अब विषयोंसे विरक्ति
कैसे हो-इसका आगेके श्लोकमें विवेचन करते हैं।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
हि
कौन्तेय
ये
संस्पर्शजाः
= क्योंकि
= हे कुन्तीनन्दन !
= जो
= इन्द्रियों और
विषयोंके संयोगसे
भोगाः
ते
आद्यन्तवन्तः
पैदा होनेवाले
= भोग (सुख) हैं,
= वे
= आदि-अन्तवाले
(और)
दुःखयोनयः, एव = दुःखके ही
कारण हैं। (अतः)
बुधः
तेषु
न, रमते
= विवेकशील मनुष्य
= उनमें
= रमण नहीं करता।
व्याख्या-'ये हि संस्पर्शजा भोगाः'-शब्द, स्पर्श,
रूप, रस और गन्ध-इन विषयोंसे इन्द्रियोंका रागपूर्वक
सम्बन्ध होनेपर जो सुख प्रतीत होता है, उसे 'भोग' कहते
हैं। सम्बन्ध-जन्य अर्थात् इन्द्रिय-जन्य भोगमें मनुष्य कभी
स्वतन्त्र नहीं है। सुख-सुविधा और मान-बड़ाई मिलनेपर
प्रसन्न होना भोग है। अपनी बुद्धिमें जिस सिद्धान्तका आदर
है, दूसरे व्यक्तिसे उसी सिद्धान्तकी प्रशंसा सुनकर जो
प्रसन्नता होती है, सुख होता है, वह भी एक प्रकारका भोग
ही है। तात्पर्य यह है कि परमात्माके सिवाय जितने भी
प्रकृतिजन्य प्राणी, पदार्थ, परिस्थितियाँ, अवस्थाएँ आदि हैं,
उनसे किसी भी प्रकृतिजन्य करणके द्वारा सुखकी अनुभूति
करना भोग ही है।
शास्त्रनिषिद्ध भोग तो सर्वथा त्याज्य हैं ही, शास्त्र-
विहित भोग भी परमात्मप्राप्तिमें बाधक होनेसे त्याज्य ही
हैं। कारण कि जडताके सम्बन्धके बिना भोग नहीं होता,
जब कि परमात्मप्राप्तिके लिये जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद
करना आवश्यक है।
'आद्यन्तवन्तः'-सम्पूर्ण भोग आने-जानेवाले हैं,
अनित्य हैं, परिवर्तनशील हैं (गीता-दूसरे अध्यायका
चौदहवाँ श्लोक)। ये कभी एकरूप रह सकते ही नहीं।
तात्पर्य है कि इन भोगोंकी स्वयंके साथ किसी भी अंशमें
एकता नहीं है। भोग आने-जानेवाले हैं और स्वयं सदा
रहनेवाला है। भोग जड हैं और स्वयं चेतन है। भोग
विकारी हैं और स्वयं निर्विकार है। भोग आदि-अन्तवाले
हैं और स्वयं आदि-अन्तसे रहित है। इसलिये स्वयंको
भोगोंसे कभी सुख नहीं मिल सकता। जीव परमात्माका
अंश है-'ममैवांशो जीवलोके' (गीता १५। ७),
इसलिये उसे परमात्मासे ही अक्षय सुख मिल सकता है-
'स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते' (गीता ५। २१)।
भोग आने-जानेवाले हैं-इस तरफ ध्यान जाते ही सुख-