श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीहरिः ॥
नम्र निवेदन
विश्व-साहित्यमें श्रीमद्भगवद्गीताका अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात् भगवान्के श्रीमुखसे निःसृत परम रहस्यमयी दिव्य वाणी है। इसमें स्वयं भगवान्ने अर्जुनको निमित्त बनाकर मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये उपदेश दिया है। इस छोटे-से ग्रन्थमें भगवान्ने अपने हृदयके बहुत ही विलक्षण भाव भर दिये हैं, जिनका आजतक कोई पार नहीं पा सका और न पा ही सकता है।
हमारे परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराजने इस अगाध गीतार्णवमें गहरे उत्तरकर अनेक गुह्यतम अमूल्य रत्न दृढ़ निकाले हैं, जिन्हें उन्होंने इस 'साधक-संजीवनी' हिन्दी-टीकाके माध्यमसे साधकोंके कल्याणार्थ उदारहृदयसे वितरित किया है। गीताकी यह टीका हमें अपनी धारणासे दूसरी टीकाओंकी अपेक्षा बहुत विलक्षण प्रतीत होती है। हमारा गीताकी दूसरी सब टीकाओंका इतना अध्ययन नहीं है, फिर भी इस टीकामें हमें अनेक श्लोकोंके भाव नये और विलक्षण लगे; जैसे— पहले अध्यायका दसवाँ, उन्नीसवाँ-बीसवाँ और पचीसवाँ श्लोक; दूसरे अध्यायका उन्तालीसवाँ-चालीसवाँ श्लोक; तीसरे अध्यायका तीसरा, दसवाँ, बारहवाँ-तेरहवाँ और तैंतालीसवाँ श्लोक; चौथे अध्यायका अठारहवाँ और अड़तीसवाँ श्लोक; पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ-चौदहवाँ श्लोक; छठे अध्यायका बीसवाँ और अड़तीसवाँ श्लोक; सातवें अध्यायका पाँचवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक; आठवें अध्यायका छठा श्लोक; नवें अध्यायका तीसरा और इकतीसवाँ श्लोक; दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक; ग्यारहवें अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ और पैतालीसवाँ-छियालीसवाँ श्लोक; बारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक; तेरहवें अध्यायका पहला और उन्नीसवाँ-बीसवाँ-इककीसवाँ श्लोक; चौदहवें अध्यायका तीसरा, बारहवाँ, सत्रहवाँ और बाईसवाँ श्लोक; पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ और ग्यारहवाँ श्लोक; सोलहवें अध्यायका पाँचवाँ और बीसवाँ श्लोक; सत्रहवें अध्यायका सातवाँ, आठवाँ, नवाँ, दसवाँ श्लोक; अठारहवें अध्यायका सतीसवा और तिहत्तरवाँ श्लोक आदि-आदि। अगर पाठक गम्भीर अध्ययन करें तो उसे और भी कई श्लोकोंमें आंशिक नये-नये भाव मिल सकते हैं।
वर्तमान समयमें साधनका तत्त्व सरलतापूर्वक बतानेवाले ग्रन्थोंका प्रायः अभाव-सा दीखता है, जिससे साधकोंको सही मार्ग-दर्शनके बिना बहुत कठिनाई होती है। ऐसी स्थितिमें परमात्मप्राप्तिके अनेक सरल उपायोंसे युक्त, साधकोपयोगी अनेक विशेष और मार्मिक बातोंसे अलंकृत तथा बहुत ही सरल एवं सुबोध भाषा-शैलीमें लिखित प्रस्तुत ग्रन्थका प्रकाशन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
परमश्रद्धेय स्वामीजीने गीताकी यह टीका किसी दार्शनिक विचारकी दृष्टिसे अथवा अपनी विद्वत्ताका प्रदर्शन करनेके लिये नहीं लिखी है, अपितु साधकोंका हित कैसे हो—इसी दृष्टिसे लिखी है। परमशान्तिकी प्राप्ति चाहनेवाले प्रत्येक साधकके लिये, चाहे वह किसी भी देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, यह टीका संजीवनी बूटीके समान है। इस टीकाका अध्ययन करनेसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि सभी धर्मोंके अनुयायियोंको अपने-अपने मतके अनुसार ही उद्धारके उपाय मिल जायेंगे। इस टीकामें साधकोंको अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी।
परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।
—प्रकाशक
तैंतीसवें संस्करणका नम्र निवेदन
श्रीमद्भगवद्गीताकी 'साधक-संजीवनी' टीका लिखनेके बाद गीताके जो नये भाव उत्पन्न हुए, उन्हें परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजने परिशिष्टके रूपमें लिख दिया। पहले यह परिशिष्ट अलग-अलग तीन भागोंमें प्रकाशित किया गया। अब उसे साधक-संजीवनी टीकामें सम्मिलित करके प्रकाशित किया जा रहा है। परिशिष्टके साथ-साथ साधक-संजीवनी टीकामें भी कहीं-कहीं आवश्यक संशोधन किया गया है। परिशिष्टमें गीताके अत्यन्त गुह्य एवं उत्तमोत्तम भावोंका प्राकट्य हुआ है। अतः आशा है कि पाठकगण साधक-संजीवनीके इस संशोधित तथा संवर्धित संस्करणसे अधिकाधिक लाभ उठानेकी चेष्टा करेंगे।
—प्रकाशक