श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २४ ]
- साधक-संजीवनी *
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मानना मानो इनको निमन्त्रण देना है।
'स युक्तः नरः' —अज्ञानके द्वारा जिनका ज्ञान ढका हुआ है, ऐसे मनुष्योंको भगवान्ने इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें जनु ( जन्तवः ) कहा है। यहाँ काम-क्रोधका वेग सहनेमें समर्थ मनुष्यको 'नरः ' कहा है। भाव यह है कि जो काम-क्रोधके वशमें हैं, वे मनुष्य कहलानेयोग्य नहीं हैं। जिसने काम-क्रोधपर विजय प्राप्त कर ली है, वही वास्तवमें नर है, शूरवीर है।
समतामें स्थित मनुष्यको योगी कहते हैं। जो अपने विवेकको महत्त्व देकर काम-क्रोधके वेगको उत्पन्न ही नहीं होने देता, वही समतामें स्थित हो सकता है।
परिशिष्ट भाव —पहले स्फुरणा होती है। उस स्फुरणामें सत्ता, आसक्ति और आग्रह होनेसे वह स्फुरणा पकड़ी जाती है और संकल्प बन जाती है। संकल्पसे मनोरथ ( मनोराज्य ) होने लगता है, जिससे काम-क्रोधादिका वेग उत्पन्न होता है ( गीता—दुसरे अध्यायका बासठवाँ, तिरसठवाँ श्लोक )। साधकके लिये एक नम्बरकी बात तो यह है कि वेग उत्पन्न ही न होने दे अर्थात् संकल्प न करे। दो नम्बरकी बात है कि वेग उत्पन्न होनेपर भी वैसी क्रिया न करे।
सम्बन्ध—बाह्य सम्बन्धसे होनेवाले सुखके अनर्थका वर्णन करके अब भगवान् आभ्यन्तर तत्त्वके सम्बन्धसे होनेवाले सुखकी महिमाका वर्णन करते हैं।
योऽन्तःसुखोऽन्तरामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
यः | = जो मनुष्य (केवल) | तथा | = तथा | स्थितिका अनुभव ---|---|---|---|--- अन्तःसुखः | = परमात्मामें सुखवाला (और) | यः | = जो | करनेवाला अन्तरामः | = (केवल) परमात्मामें रमण करनेवाला है | अन्तर्ज्योतिः, | | (ब्रह्मरूप बना हुआ) | | एव | = केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है, | योगी = सांख्ययोगी | | सः | = वह | ब्रह्मनिर्वाणम् = निर्वाण ब्रह्मको | | ब्रह्मभूतः | = ब्रह्ममें अपनी | अधिगच्छति = प्राप्त होता है।
व्याख्या —'योऽन्तःसुखोऽन्तरामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः '—जिसको प्रकृतिजन्म बाह्य पदार्थोंमें सुख प्रतीत नहीं होता, प्रत्युत एकमात्र परमात्मामें ही सुख मिलता है, ऐसे साधकको यहाँ 'अन्तःसुखः ' कहा गया है। परमात्मतत्त्वके सिवाय कहीं भी उसकी सुख-बुद्धि नहीं रहती। परमात्म-तत्त्वमें सुखका अनुभव उसे हर समय होता है; क्योंकि उसके सुखका आधार बाह्य पदार्थोंका संयोग नहीं होता।
स्वयं अपनी सतामें निरन्तर स्थित रहनेके लिये बाह्यकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। स्वयंको स्वयंसे दुःख नहीं होता, स्वयंको स्वयंसे अरुचि नहीं
'स सुखी' —मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी काम-क्रोध उत्पन्न होनेपर सुख-शान्तिसे नहीं रह सकते। इसलिये जिस मनुष्यने काम-क्रोधके संकल्पको मिटा दिया है, वही वास्तवमें सुखी है। कारण कि काम-क्रोधका संकल्प उत्पन्न होते ही मनुष्यके अन्तःकरणमें अशान्ति, चंचलता, संघर्ष आदि दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए वह सुखी कैसे कहा जा सकता है? जब वह काम-क्रोधके वेगके वशीभूत हो जाता है, तब वह दुःखी हो ही जाता है। कारण कि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका आश्रय लेकर, उनसे सम्बन्ध जोड़कर सुख चाहनेवाला मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता—यह नियम है।
होती—यह अन्तःसुख है।
जो सदाके लिये न मिले और सभीको न मिले, वह 'बाह्य' है। परन्तु जो सदाके लिये मिले और सभीको मिले, वह 'आभ्यन्तर' है।
जो भोगोंमें रमण नहीं करता, प्रत्युत केवल परमात्म-तत्त्वमें ही रमण करता है, और व्यवहारकालमें भी जिसका एकमात्र परमात्मतत्त्वमें ही व्यवहार हो रहा है, ऐसे साधकको यहाँ 'अन्तरामः ' कहा गया है।
इन्द्रियजन्म ज्ञान, बुद्धिजन्म ज्ञान आदि जितने भी सांसारिक ज्ञान कहे जाते हैं, उन सबका प्रकाश और