भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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पृष्ठ 406

श्लोक २७-२८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुरचैवान्तरे भुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥

बाह्यान्= बाहरकेनासिकामेंमोक्षपरायण है
स्पर्शान्= पदार्थोंकोविचरनेवाले(तथा)
बहिः= बाहरप्राणापानौ = प्राण और अपानविगतेच्छा-
एव= हीवायुकोभयक्रोधः
कृत्वा= छोड़करसमौ = सम= (जो) इच्छा,
= औरकृत्वा = करकेभय और
चक्षुः= नेत्रोंकी दृष्टिकोयतेन्द्रियमनोबुद्धिः = जिसकीक्रोधसे सर्वथा
भुवोः= भौंहोंकेइन्द्रियाँ, मनरहित है,
अन्तरे= बीचमें (स्थित
करके)और बुद्धि अपने
वशमें हैं,सः = वह
नासाभ्यन्तर-यः = जोमुनिः = मुनि
चारिणौ= (तथा)मोक्षपरायणः = (केवल)सदा = सदा
मुक्तः = मुक्त
एव = ही है।

व्याख्या —‘स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्’—परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।

बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।

वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है—इनसे रगपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है।

‘चक्षुरचैवान्तरे भुवोः’—यहाँ ‘भुवोः अन्तरे’ पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता—छठे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)—ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।

ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है, और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।

‘प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ’—नासिकासे बाहर निकलनेवाली वायुको ‘प्राण’ और नासिकाके भीतर जानेवाली वायुको ‘अपान’ कहते हैं।

प्राणवायुकी गति दीर्घ और अपानवायुकी गति लघु होती है। इन दोनोंको सम करनेके लिये पहले बार्यों नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर दार्यों नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। फिर दार्यों नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर बार्यों नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। इन सब क्रियाओंमें बराबर समय लगना चाहिये। इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहनेसे प्राण और अपानवायुकी गति सम, शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिकाके बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्शका ज्ञान न हो, तब समझना चाहिये कि प्राण-अपानकी गति सम हो गयी है। इन दोनोंकी गति सम होनेपर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मनसे स्वाभाविक ही परमात्माका चिन्तन होने लगता है। ध्यानयोगमें इस प्राणायामकी आवश्यकता होनेसे ही इसका उपर्युक्त पदोंमें उल्लेख किया गया है।

‘यतेन्द्रियमनोबुद्धिः’—प्रत्येक मनुष्यमें एक तो इन्द्रियोंका ज्ञान रहता है और एक बुद्धिका ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि—दोनोंके बीचमें मनका निवास है। मनुष्यको देखना यह है कि उसके मनपर इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है