श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
अवतरणिका—
पाँचवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने यह बात पूछी थी कि सांख्ययोग और कर्मयोग—इन दोनोंमें श्रेष्ठ कौन है? इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि ये दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं; परन्तु कर्मसंन्यास और कर्मयोग—इन दोनोंमें कर्मयोग श्रेष्ठ है—‘तयोस्तु कर्मसन्त्यासत्कर्मयोगो विशिष्यते’ (५।२)।
अब दोनों कल्याण करनेवाले कैसे हैं—इसका वर्णन भगवान्ने पाँचवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकतक किया। फिर सांख्ययोग तथा कर्मयोगके लिये उपयोगी और स्वतन्त्रतासे कल्याण करनेवाले ध्यानयोगका संक्षेपसे दो श्लोकोंमें वर्णन किया तथा अन्तमें अपनी ही तरफसे भक्तिकी निष्ठा बताकर पाँचवें अध्यायके विषयका उपसंहार किया।
अब पुनः कर्मयोगकी श्रेष्ठता बतानेके लिये भगवान् छठे अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स सन्यासी च योगी च न निरग्निरन चाक्रियः ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| कर्मफलम् | = कर्मफलका | सन्यासी | = संन्यासी | होता |
|---|---|---|---|---|
| अनाश्रितः | = आश्रय न लेकर | च | = तथा | च |
| यः | = जो | योगी | = योगी है | अक्रियः |
| कार्यम् | = कर्तव्य | च | = और | |
| कर्म | = कर्म | निरग्नः | = (केवल) अग्निका | |
| करोति | = करता है, | त्याग करनेवाला | न | |
| सः | = वही | न | = (संन्यासी) नहीं |
व्याख्या—‘अनाश्रितः कर्मफलम्’ —इन पदोंका आशय यह प्रतीत होता है कि मनुष्यको किसी उत्पत्ति-विनाशशील वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया आदिका आश्रय नहीं रखना चाहिये। कारण कि यह जीव स्वयं परमात्माका अंश होनेसे नित्य-निरन्तर रहनेवाला है और यह जिन वस्तु, व्यक्ति आदिका आश्रय लेता है, वे उत्पत्ति-विनाशशील तथा प्रतिक्रियण परिवर्तित होनेवाले हैं। वे तो परिवर्तनशील होनेके कारण नष्ट हो जाते हैं और यह (जीव) रीता-का-रीता रह जाता है। केवल रीता ही नहीं रहता, प्रत्युत उनके रागको पकड़े रहता है। जबतक यह उनके रागको पकड़े रहता है, तबतक इसका कल्याण नहीं
होता अर्थात् वह राग उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बन जाता है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। अगर यह उस रागका त्याग कर दे तो यह स्वतः मुक्त हो जायगा। वास्तवमें यह स्वतः मुक्त है ही, केवल रागके कारण उस मुक्तिका अनुभव नहीं होता। अतः भगवान् कहते हैं कि मनुष्य कर्मफलका आश्रय न रखकर कर्तव्य-कर्म करे। कर्मफलके आश्रयका त्याग करनेवाला तो नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है, पर कर्मफलका आश्रय रखनेवाला बँध जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीनों शरीर ‘कर्मफल’