श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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वह 'सात्त्विक त्याग' है, जिससे पदार्थों और क्रियाओंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और मनुष्य त्यागी अर्थात् योगी हो जाता है। इसी तरह संन्यासी भी कर्तृत्वाभिमानका त्यागी होता है। अतः दोनों ही त्यागी हैं। तात्पर्य है कि योगी और संन्यासीमें कोई भेद नहीं है। भेद न रहनेसे ही भगवान्ने पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहा है कि राग-द्वेषका त्याग करनेवाला योगी 'संन्यासी' ही है।
'न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन' — मनमें जो स्फुरणएँ होती हैं अर्थात् तरह-तरहकी बातें याद आती हैं, उनमेंसे जिस स्फुरणा-(बात-) के साथ मन चिपक जाता है, जिस स्फुरणाके प्रति प्रियता-अप्रियता पैदा हो जाती है, वह 'संकल्प' हो जाता है। उस संकल्पका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं होता, प्रत्युत भोगी होता है। कारण कि परमात्माके साथ सम्बन्धका नाम 'योग' है और जिसकी भीतरसे ही पदार्थमें महत्त्व, सुन्दर तथा सुख-बुद्धि है, वह (भीतरसे पदार्थके साथ सम्बन्ध माननेसे) भोगी ही होगा, योगी हो ही नहीं सकता। वह योगी तो तब होता है, जब उसकी असत् पदार्थमें महत्त्व, सुन्दर तथा सुख-बुद्धि नहीं रहती और तभी वह सम्पूर्ण संकल्पोंका
त्यागी होता है तथा उसको भगवान्के साथ अपने नित्य सम्बन्धका अनुभव होता है।
यहाँ 'कश्चन' पदसे यह अर्थ भी लिया जा सकता है कि संकल्पका त्याग किये बिना मनुष्य कोई-सा भी योगी अर्थात् कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, भक्तियोगी, हठयोगी, लययोगी आदि नहीं होता। कारण कि उसका सम्बन्ध उत्पन्न और नष्ट होनेवाले जड़ पदार्थके साथ है; अतः वह योगी कैसे होगा? वह तो भोगी ही होगा। ऐसे भोगी केवल मनुष्य ही नहीं हैं, प्रत्युत पशु-पक्षी आदि भी भोगी हैं; क्योंकि उन्होंने भी संकल्पोंका त्याग नहीं किया है।
तात्पर्य यह निकला कि जबतक असत् पदार्थके साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध रहेगा अर्थात् अपने-आपको कुछ-न-कुछ मानेगा, तबतक मनुष्य कोई-सा भी योगी नहीं हो सकता अर्थात् असत् पदार्थके साथ सम्बन्ध रखते हुए वह कितना ही अभ्यास कर ले, समाधि लगा ले, गिरि-कन्दराओंमें चला जाय, तो भी गीताके सिद्धान्तके अनुसार वह योगी नहीं कहा जा सकता।
ऐसे तो संन्यास और योगकी साधना अलग-अलग है, पर संकल्पोंके त्यागमें दोनों साधन एक हैं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें जिस योगकी प्रशंसा की गयी है, उस योगकी प्रापिका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
आरुरुक्षोर्मुनेयोंगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥
योगम् | = जो योग (समता) में | योगीके लिये | योगारूढस्य | = योगारूढ मनुष्यका ---|---|---|---|--- आरुरुक्षोः | = आरूढ होना चाहता है, (ऐसे) | कर्म | = कर्तव्यकर्म करना | शमः | = शम (शान्ति) मुनेः | = मननशील | कारणम् | = कारण | कारणम् | = (परमात्मप्राप्तिमें) कारण | | उच्यते | = कहा गया है (और) | उच्यते | = कहा गया है। | | तस्य, एव | = उसी | |
व्याख्या—'आरुरुक्षोर्मुनेयोंगं कर्म कारणमुच्यते' — जो योग-(समता-) में आरूढ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगीके लिये (योगारूढ होनेमें) निष्कामभावसे कर्तव्य-कर्म करना कारण है। तात्पर्य है कि करनेका वेग मिटानेमें प्राप्त कर्तव्य-कर्म करना कारण है; क्योंकि कोई भी व्यक्ति जन्मा है, पला है और जीवित है तो उसका जीवन दूसरोंकी सहायताके बिना चल ही नहीं सकता। उसके पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहमृतक कोई ऐसी चीज नहीं है, जो प्रकृतिकी न हो। इसलिये जबतक
वह इन प्राकृत चीजोंको संसारकी सेवामें नहीं लगाता, तबतक वह योगारूढ नहीं हो सकता अर्थात् समतामें स्थित नहीं हो सकता; क्योंकि प्राकृत वस्तुमात्रकी संसारके साथ एकता है, अपने साथ एकता है ही नहीं।
प्राकृत पदार्थमें जो अपनापन दीखता है, उसका तात्पर्य है कि उनको दूसरोंकी सेवामें लगानेका दायित्व हमारेपर है। अतः उन सबको दूसरोंकी सेवामें लगानेका भाव होनेसे सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जायगा और वह स्वयं योगारूढ हो जायगा। यही बात भगवान्ने दूसरी