भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 418

श्लोक ४]

  • साधक-संजीवनी *

४१७

सम्बन्ध—योगारूढ़ कौन होता है—इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्कल्पसन्त्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥

हि | = कारण कि | न | = न | सर्वसङ्कल्प- | ---|---|---|---|---|--- यदा | = जिस समय | कर्मसु | = कर्मोंमें (ही) | सन्त्यासी | = सम्पूर्ण संकल्पोंका न | = न | अनुषज्जते | = आसक्त होता है, | | त्यागी मनुष्य इन्द्रियार्थेषु | = इन्द्रियोंके भोगोंमें | तदा | = उस समय | योगारूढः | = योगारूढ़ | (तथा) | | (वह) | उच्यते | = कहा जाता है।

व्याख्या—‘यदा हि नेन्द्रियार्थेषु ( अनुषज्जते )’— साधक इन्द्रियोंके अर्थोंमें अर्थात् प्रारम्भके अनुसार प्राप्त होनेवाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँचों विषयोंमें; अनुकूल पदार्थ, परिस्थिति, घटना, व्यक्ति आदिमें और शरीरके आराम, मान, बड़ाई आदिमें आसक्ति न करे, इनका भोगबुद्धिसे भोग न करे, इनमें राजी न हो, प्रत्युत यह अनुभव करे कि ये सब विषय, पदार्थ आदि आये हैं और प्रतिक्रियण चले जा रहे हैं। ये आने-जानेवाले और अनित्य हैं, फिर इनमें क्या राजी हों—ऐसा अनुभव करके इनसे निर्लप रहे।

इन्द्रियोंके भोगोंमें आसक्त न होनेका साधन है—इच्छापूर्तिका सुख न लेना। जैसे, कोई मनचाही बात हो जाय; मनचाही वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदि मिल जाय और जिसको नहीं चाहता, वह न हो तो मनुष्य उसमें राजी (प्रसन्न) हो जाता है तथा उससे सुख लेता है। सुख लेनेपर इन्द्रियोंके भोगोंमें आसक्ति बढ़ती है। अतः साधकको चाहिये कि अनुकूल वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदिके मिलनेकी इच्छा न करे और बिना इच्छाके अनुकूल वस्तु आदि मिल भी जाय तो उसमें राजी न हो। ऐसा होनेसे इन्द्रियोंके भोगोंमें आसक्ति नहीं होगी।

दूसरी बात, मनुष्यके पास अनुकूल चीजें न होनेसे यह उन चीजोंके अभावका अनुभव करता है और उनके मिलनेपर यह उनके अधीन हो जाता है। जिस समय इसको अभावका अनुभव होता था, उस समय भी परतन्त्रता थी और अब उन चीजोंके मिलनेपर भी ‘कहीं इनका वियोग न हो जाय’—इस तरहकी परतन्त्रता होती है। अतः वस्तुके न मिलने और मिलनेमें फर्क इतना ही रहा कि वस्तुके न

मिलनेसे तो वस्तुकी परतन्त्रताका अनुभव होता था, पर वस्तुके मिलनेपर परतन्त्रताका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत उसमें मनुष्यको स्वतन्त्रता दीखती है—यह उसको धोखा होता है। जैसे कोई किसीके साथ विश्वासघात करता है, ऐसे ही अनुकूल परिस्थितिमें राजी होनेसे मनुष्य अपने साथ विश्वासघात करता है। कारण कि यह मनुष्य अनुकूल परिस्थितिके अधीन हो जाता है, उसको भोगते-भोगते इसका स्वभाव बिगड़ जाता है और बार-बार सुख भोगनेकी कामना होने लगती है। यह सुखभोगकी कामना ही इसके जन्म-मरणका कारण बन जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि अनुकूलताकी इच्छा करना, आशा करना और अनुकूल विषय आदिमें राजी होना—यह सम्पूर्ण अनर्थोंका मूल है। इससे कोई-सा भी अनर्थ, पाप बाकी नहीं रहता। अगर इसका त्याग कर दिया जाय तो मनुष्य योगारूढ़ हो जाता है।

तीसरी बात, हमारे पास निर्वाहमात्रके सिवाय जितनी अनुकूल भोग्य वस्तुएँ हैं, वे अपनी नहीं हैं। वे किसकी हैं, इसका हमें पता नहीं है; परन्तु जब कोई अभावग्रस्त प्राणी मिल जाय, तो उस सामग्रीको उसीकी समझकर उसके अर्पण कर देनी चाहिये [यह आपकी ही है—ऐसा उससे कहना नहीं है], और उसे देकर ऐसा मानना चाहिये कि निर्वाहसे अतिरिक्त जो वस्तुएँ मेरे पास पड़ी थीं, उस ऋणसे मैं मुक्त हो गया हूँ। तात्पर्य है कि निर्वाहसे अतिरिक्त वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न माननेसे मनुष्यकी भोगोंमें आसक्ति नहीं होती।

‘न कर्मस्वनुषज्जते’* —जैसे इन्द्रियोंके अर्थोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये, ऐसे ही कर्मोंमें भी आसक्ति नहीं

  • यहाँ ‘कर्मसु’ पद बहुवचन है, जिसका तात्पर्य है कि आसक्त पुरुषमें अनेक कर्मोंकी और उनके फलोंकी इच्छा रहती है। परन्तु अठारहवें अध्यायके पैतालीसवें श्लोकमें ‘कर्मणि’ पद एकवचन है, जिसका तात्पर्य है कि आसक्तिरहित पुरुषके द्वारा कर्म तो अनेक होते हैं, पर उसमें कर्तव्यबुद्धि एक ही रहती है।