श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
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सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ध्यानयोगके लिये प्रेरणा की। ध्यानयोगका साधन कैसे करे—इसके लिये अब आगेके तीन श्लोकोंमें ध्यानयोगकी उपयोगी बातें बताते हैं।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रुतं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
| शुचौ | = शुद्ध | बिछे हैं, | (ऐसे) |
|---|---|---|---|
| देशे | = भूमिपर, | न | = (जो) न |
| चैलाजिन- | अत्युच्छ्रुतम् | = अत्यन्त ऊँचा है | |
| कुशोत्तरम् | = (जिसपर क्रमशः) | (और) | |
| कुश, मृगछाला | न | = न | |
| और वस्त्र | अतिनीचम् | = अत्यन्त नीचा, | |
| प्रतिष्ठाप्य = स्थापन करके। |
व्याख्या—‘शुचौ देशे’ —भूमिकी शुद्ध दो तरहकी होती है—(१) स्वाभाविक शुद्ध स्थान; जैसे—गंगा आदिका किनारा; जंगल; तुलसी, आँवला, पीपल आदि पवित्र वृक्षोंके पासका स्थान आदि और (२) शुद्ध किया हुआ स्थान; जैसे—भूमिको गायके गोबरसे लीपकर अथवा जल छिड़कर शुद्ध किया जाय; जहाँ मिट्टी हो, वहाँ ऊपरकी चार-पाँच अंगुल मिट्टी दूर करके भूमिको शुद्ध किया जाय। ऐसी स्वाभाविक अथवा शुद्ध की हुई समतल भूमिमें काठ या पत्थरकी चौकी आदिको लगा दे।
‘चैलाजिनकुशोत्तरम्’ —यद्यपि पाठके अनुसार क्रमशः वस्त्र, मृगछाला और कुश बिछानी चाहिये*, तथापि बिछानेमें पहले कुश बिछा दे, उसके ऊपर बिना मारे हुए मृगका अर्थात् अपने-आप मरे हुए मृगका चर्म बिछा दे; क्योंकि मारे हुए मृगका चर्म अशुद्ध होता है। अगर ऐसी मृगछाला न मिले, तो कुशपर टाटका बोरा अथवा ऊनका कम्बल बिछा दे। फिर उसके ऊपर कोमल सूती कपड़ा बिछा दे।
वाराहभगवान्के रोमसे उत्पन्न होनेके कारण कुश बहुत पवित्र माना गया है; अतः उससे बना आसन काममें लाते हैं। ग्रहण आदिके समय सूतकसे बचनेके लिये अर्थात् शुद्धिके लिये कुशको पदार्थोंमें, कपड़ोंमें रखते हैं। पवित्री, प्रोक्षण आदिमें भी इसको काममें लेते हैं। अतः भगवान्ने कुश बिछानेके लिये कहा है।
कुश शरीरमें गड़े नहीं और हमारे शरीरमें जो विद्युत्-
शक्ति है वह आसनमेंसे होकर जमीनमें न चली जाय, इसलिये (विद्युत्-शक्तिको रोकनेके लिये) मृगछाला बिछानेका विधान आया है।
मृगछालाके रोम (रोएँ) शरीरमें न लगें और आसन कोमल रहे, इसलिये मृगछालाके ऊपर सूती शुद्ध कपड़ा बिछानेके लिये कहा गया है। अगर मृगछालाकी जगह कम्बल या टाट हो, तो वह गरम न हो जाय, इसलिये उसपर सूती कपड़ा बिछाना चाहिये।
‘नात्युच्छ्रुतं नातिनीचम्’ —समतल शुद्ध भूमिमें जो तख्त या चौकी रखी जाय, वह न अत्यन्त ऊँची हो और न अत्यन्त नीची हो। कारण कि अत्यन्त ऊँची होनेसे ध्यान करते समय अचानक नींद आ जाय तो गिरनेकी और चोट लगनेकी सम्भावना रहेगी और अत्यन्त नीची होनेसे भूमिपर घूमनेवाले चींटी आदि जन्तुओंके शरीरपर चढ़ जानेसे और काटनेसे ध्यानमें विशेष होगा। इसलिये अति ऊँचे और अति नीचे आसनका निषेध किया गया है।
‘प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः’ —ध्यानके लिये भूमिपर जो आसन—चौकी या तख्त रखा जाय, वह हिलनेवाला न हो। भूमिपर उसके चारों पाये ठीक तरहसे स्थिर रहें।
जिस आसनपर बैठकर ध्यान आदि किया जाय, वह आसन अपना होना चाहिये, दूसरेका नहीं; क्योंकि दूसरेका आसन काममें लिया जाय तो उसमें वैसे ही परमाणु रहते हैं। अतः यहाँ ‘आत्मनः’ पदसे अपना आसन अलग
- श्लोकमें जैसा पाठ है, अगर वैसा ही लिया जाय तो नीचे कपड़ा, उसके ऊपर मृगछाला और उसके ऊपर कुश बिछानी पड़ेगी। परन्तु यह क्रम लेना युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि कुश शरीरमें गड़ती है। अतः नीचे कुश, उसके ऊपर मृगछाला और उसके ऊपर कपड़ा—ऐसा क्रम लिया गया है; क्योंकि पाठ-क्रमसे अर्थ-क्रम बलवान् होता है—‘पाठक्रमार्थक्रमो बलीवान्’।