भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक १५ ]

  • साधक-संजीवनी *

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हमारा लक्ष्य परमात्माके चिन्तनका है, संसारके चिन्तनका नहीं। अतः जिस संसारका चिन्तन हो रहा है, वह संसार पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा और अभी भी नहीं है। परन्तु जिन परमात्माका चिन्तन करना है, वे परमात्मा पहले भी थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे। इस तरह सांसारिक वस्तु आदिके चिन्तनसे मनको हटाकर परमात्मामें लगा देना चाहिये। कारण कि भूतकालका कितना ही चिन्तन किया जाय, उससे लाभ तो कुछ होगा नहीं और भविष्यका चिन्तन किया जाय तो वह काम अभी कर सकेंगे नहीं तथा भूत-भविष्यका चिन्तन होता रहनेसे जो अभी ध्यान करते हैं, वह भी होगा नहीं तो सब ओरसे रीते ही रह जायेंगे।

‘युक्तः’—ध्यान करते समय सावधान रहे अर्थात् मनको संसारसे हटाकर भगवान्में लगानेके लिये सदा सावधान, जाग्रत रहे। इसमें कभी प्रमाद, आलस्य आदि न करे। तात्पर्य है कि एकान्तमें अथवा व्यवहारमें भगवान्में

मन लगानेकी सावधानी सदा बनी रहनी चाहिये; क्योंकि चलते-फिरते, काम-धन्धा करते समय भी सावधानी रहनेसे एकान्तमें मन अच्छा लगेगा और एकान्तमें मन अच्छा लगनेसे व्यवहार करते समय भी मन लगानेमें सुविधा होगी। अतः ये दोनों एक-दूसरेके सहायक हैं अर्थात् व्यवहारकी सावधानी एकान्तमें और एकान्तकी सावधानी व्यवहारमें सहायक है।

‘आसीत मत्परः’—केवल भगवत्परायण होकर बैठे अर्थात् उद्देश्य, लक्ष्य, ध्येय केवल भगवान्का ही रहे। भगवान्के सिवाय कोई भी सांसारिक वासना, आसक्ति, कामना, स्मृहा, ममता आदि न रहे।

इसी अध्यायके दसवें श्लोकमें ‘योगी युज्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः’ पदोंसे ध्यानयोगका जो उपक्रम किया था, उसीको यहाँ ‘युक्त आसीत मत्परः’ पदोंसे कहा गया है।

परिशिष्ट भाव —अपनी विशेषता माननेसे आसुरी ध्यानयोगीके लिये भी अपने परायण होनेकी बात कही है। भगवत्परायणतामें भगवान्का बल रहनेसे विकार शीघ्र दूर हो जाते हैं और अभिमान भी नहीं होता। यह भक्तिकी विशेषता है।

इस श्लोकमें ‘मन’ और ‘चित्’—ये दो समानार्थक पद आये हैं। ‘मन’ से किसी वस्तुका बार-बार मनन किया जाता है और ‘चित्’ से किसी एक ही वस्तुका चिन्तन किया जाता है। अतः यहाँ आये ‘मनः संयम्य मच्चित्तः’ पदोंका तात्पर्य है कि संसारका मनन नहीं करे अर्थात् मनको संसारसे हटा ले और चित्तसे केवल भगवान्का चिन्तन करे अर्थात् चित्तको केवल भगवान्में लगा दे।

युज्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥

नियतमानसः= वशमें किये हुए मनवालासदा= सदानिर्वाणपरमाम्= (जो) निर्वाणपरमा
योगी= योगीयुज्जन्= (परमात्मामें) लगाता हुआशान्तिम्= शान्ति है, (उसको)
आत्मानम्= मनकोमत्संस्थाम्= मुझमें सम्यक् स्थितिवालीअधिगच्छति= प्राप्त हो जाता है।
एवम्= इस तरहसे

व्याख्या —‘योगी नियतमानसः’—जिसका मनपर अधिकार है, वह ‘नियतमानसः’ है। साधक ‘नियतमानस’ तभी हो सकता है, जब उसके उद्देश्यमें केवल परमात्मा ही रहते हैं। परमात्माके सिवाय उसका और किसीसे सम्बन्ध नहीं रहता। कारण कि जबतक उसका सम्बन्ध संसारके साथ बना रहता है, तबतक उसका मन नियत नहीं हो सकता।

साधकसे यह एक बड़ी गलती होती है कि वह अपने-आपको गृहस्थ आदि मानता है और साधन ध्यानयोगका करता है। जिससे ध्यानयोगकी सिद्धि जल्दी नहीं होती। अतः साधकको चाहिये कि वह अपने-आपको गृहस्थ, साधु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि किसी वर्ण-आश्रमका न मानकर ऐसा माने कि ‘मैं तो केवल ध्यान करनेवाला हूँ। ध्यानसे परमात्माकी प्राप्ति करना ही मेरा काम

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