भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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पूँजी है—(१) सांसारिक धन-धान्य और (२) आयु। पहली पूँजी—धन-धान्यपर विचार किया जाय तो उपार्जन अधिक करना तो चल जायगा, पर उपार्जनकी अपेक्षा अधिक खर्चा करनेसे काम नहीं चलेगा। इसलिये आहार-विहारमें छः घंटे न लगाकर चार घंटेसे ही काम चला ले और खेती, व्यापार आदिमें आठ घंटे लगा दे। तात्पर्य है कि आहार-विहारका समय कम करके जीविका-सम्बन्धी कार्योंमें अधिक समय लगा दे।

दूसरी पूँजी—आयुपर विचार किया जाय तो सोनेमें आयु व्यर्थ खर्च होती है। अतः सोनेमें छः घंटे न लगाकर चार घंटेसे ही काम चला ले और भजन-ध्यान आदिमें आठ घंटे लगा दे। तात्पर्य है कि जितना कम सोनेसे काम चल जाय, उतना चला ले और नींदका बचा हुआ समय भगवान्के भजन-ध्यान आदिमें लगा दे। इस उपार्जन-(साधन-भजन-)

की मात्रा तो दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही रहनी चाहिये; क्योंकि हम यहाँ सांसारिक धन-वैभव आदि कमानेके लिये नहीं आये हैं, प्रत्युत परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये ही आये हैं। इसलिये दूसरे समयमेंसे जितना समय निकाल सकें, उतना समय निकालकर अधिक-से-अधिक भजन-ध्यान करना चाहिये।

दूसरी बात, जीविका-सम्बन्धी कर्म करते समय भी भगवान्को याद रखे और सोते समय भी भगवान्को याद रखे। सोते समय यह समझे कि अबतक चलते-फिरते, बैठकर भजन किया है, अब लेटकर भजन करना है। लेटकर भजन करते-करते नींद आ जाय तो आ जाय, पर नींदके लिये नींद नहीं लेनी है। इस प्रकार लेटकर भगवत्स्मरण करनेका समय पूरा हो गया, तो फिर उठकर भजन-ध्यान, सत्संग-स्वाध्याय करे और भगवत्स्मरण करते हुए ही काम-धंधमें लग जाय, तो सब-का-सब काम-धंधा भजन हो जायगा।

परिशिष्ट भाव —सोलहवाँ और सत्रहवाँ श्लोक ध्यानयोगीके लिये तो उपयोगी हैं ही, अन्य योगियों (साधकों) के लिये भी बड़े उपयोगी हैं।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें ध्यानयोगके लिये अन्वय-व्यतिरेक-रीतिसे खास नियम बता दिये। अब ऐसे नियमोंका पालन करते हुए स्वरूपका ध्यान करनेवाले साधककी क्या स्थिति होती है, यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।

निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८ ॥

विनियतम्= वशमें किया हुआअवतिष्ठते= स्थित हो(हो जाता है),
चित्तम्= चित्तजाता है (और)तदा
यदा= जिस कालमेंसर्वकामेभ्यः= (स्वयं) सम्पूर्णयुक्तः
आत्मनि= अपने स्वरूपमेंपदार्थोंसेइति
एव= हीनिःस्पृहः= निःस्पृहउच्यते

व्याख्या —[इस अध्यायके दसवेंसे तेरहवें श्लोकतक सभी ध्यानयोगी साधकोंके लिये बिछाने और बैठनेवाले आसनोंकी विधि बतायी। चौदहवें और पंद्रहवें श्लोकमें सगुण-साकारके ध्यानका फलसहित वर्णन किया। फिर सोलहवें-सत्रहवें श्लोकोंमें सभी साधकोंके लिये उपयोगी

नियम बताये। अब इस (अठारहवें) श्लोकसे लेकर तेईसवें श्लोकतक स्वरूपके ध्यानका फलसहित वर्णन करते हैं।]

‘यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते’ —अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ चित्त* अर्थात् संसारके चिन्तनसे

  • (क) चित्तकी पाँच अवस्थाएँ मानी गयी हैं—मूढ़, क्षिप्त, विशिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। इनमें ‘मूढ़’ और ‘क्षिप्त’ वृत्तिवाला पुरुष योगका अधिकारी होता ही नहीं। चित्त कभी स्वरूपमें लगता है और कभी नहीं लगता—ऐसा ‘विशिप्त’ वृत्तिवाला पुरुष योगका अधिकारी होता है। जब चित्तवृत्ति ‘एकाग्र’ हो जाती है, तब सविकल्प समाधि होती है। एकाग्रवृत्तिके बाद जब चित्तकी ‘निरुद्ध’ अवस्था होती है, तब निर्विकल्प समाधि होती है। इस निर्विकल्प समाधिको ही ‘योग’ कहा गया है।

यहाँ भगवान्ने ‘विनियतं चित्तम्’ पदोंसे एकाग्रवृत्ति अर्थात् सविकल्प समाधिका संकेत किया है।

(ख) इसी अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें जिसको ‘नियतमानसः’ कहा गया है, उसकी अवस्थाका वर्णन यहाँ किया गया है।