श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
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कुछ भी चिन्तन नहीं होता।
पूर्वश्लोकमें जिस योगीके चित्तको विनियत कहा गया
है, उस वशीभूत किये हुए चित्तवाले योगीके लिये यहाँ
'यतचित्तस्य' पद आया है।
कोई भी स्थान वायुसे सर्वथा रहित नहीं होता। वायु
सर्वत्र रहती है। कहींपर वायु स्पन्दनरूपसे रहती है और
कहींपर निःस्पन्दनरूपसे रहती है। इसलिये यहाँ 'निवातस्थः'
पद वायुके अभावका वाचक नहीं है, प्रत्युत स्पन्दित वायुके
अभावका वाचक है।
यहाँ उपमेय चित्तको पर्वत आदि स्थिर, अचल पदार्थोंकी
उपमा न देकर दीपककी लौकी ही उपमा क्यों दी गयी ?
दीपककी लौ तो स्पन्दित वायुसे हिल भी सकती है, पर पर्वत
कभी हिलता ही नहीं। अतः पर्वतकी ही उपमा देनी चाहिये
थी ? इसका उत्तर यह है कि पर्वत स्वभावसे ही स्थिर, अचल
और प्रकाशहीन है, जब कि दीपककी लौ स्वभावसे चंचल और
प्रकाशमान है। चंचल वस्तुको स्थिर रखनेमें विशेष कठिनता
पड़ती है। चित्त भी दीपककी लौके समान स्वभावसे ही चंचल
है, इसलिये चित्तको दीपककी लौकी उपमा दी गयी है।
दूसरी बात, जैसे दीपककी लौ प्रकाशमान होती है,
ऐसे ही योगीके चित्तकी परमात्मतत्त्वमें जागृति रहती है।
यह जागृति सुषुप्तिसे विलक्षण है। यद्यपि सुषुप्ति और
समाधि-इन दोनोंमें संसारकी निवृत्ति समान रहती है,
तथापि सुषुप्तिमें चित्तवृत्ति अविद्यामें लीन हो जाती है।
अतः उस अवस्थामें स्वरूपका भान नहीं होता। परन्तु
समाधिमें चित्तवृत्ति जाग्रत् रहती है अर्थात् चित्तमें स्वरूपकी
जागृति रहती है। इसीलिये यहाँ दीपककी लौका दृष्टान्त
दिया गया है। इसी बातको चौथे अध्यायके सत्ताईसवें
श्लोकमें 'ज्ञानदीपिते' पदसे कहा है।
सम्बन्ध-जिस अवस्थामें पूर्णता प्राप्त होती है, उस अवस्थाका आगेके श्लोकमें स्पष्ट वर्णन करते हैं।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ २० ॥
योगसेवया
= योगका सेवन
करनेसे
यत्र
= जिस अवस्थामें
निरुद्धम्
= निरुद्ध
चित्तम्
= चित्त
उपरमते
= उपराम हो जाता है
च
= तथा
यत्र
= जिस अवस्थामें
(स्वयं)
आत्मना
= अपने-आपसे
आत्मानम्
= अपने-आपको
पश्यन्
= देखता हुआ
आत्मनि
= अपने-आपमें
एव
= ही
तुष्यति
= सन्तुष्ट हो जाता है।
व्याख्या-'यत्रोपरमते चित्तं ........ पश्यन्नात्मनि
तुष्यति'-ध्यानयोगमें पहले 'मनको केवल स्वरूपमें ही
लगाना है' यह धारणा होती है। ऐसी धारणा होनेके बाद
स्वरूपके सिवाय दूसरी कोई वृत्ति पैदा हो भी जाय, तो
उसकी उपेक्षा करके उसे हटा देने और चित्तको केवल
स्वरूपमें ही लगानेसे जब मनका प्रवाह केवल स्वरूपमें
ही लग जाता है, तब उसको ध्यान कहते हैं। ध्यानके समय
ध्याता, ध्यान और ध्येय-यह त्रिपुटी रहती है अर्थात्
साधक ध्यानके समय अपनेको ध्याता (ध्यान करनेवाला)
मानता है, स्वरूपमें तद्रूप होनेवाली वृत्तिको ध्यान मानता
है और साध्यरूप स्वरूपको ध्येय मानता है। तात्पर्य है कि
जबतक इन तीनोंका अलग-अलग ज्ञान रहता है, तबतक
वह 'ध्यान' कहलाता है। ध्यानमें ध्येयकी मुख्यता होनेके
कारण साधक पहले अपनेमें ध्यातापना भूल जाता है। फिर
ध्यानकी वृत्ति भी भूल जाता है। अन्तमें केवल ध्येय ही
जाग्रत् रहता है। इसको 'समाधि' कहते हैं। यह 'संप्रज्ञात-
समाधि' है, जो चित्तकी एकाग्र अवस्थामें होती है। इस
समाधिके दीर्घकालके अभ्याससे फिर 'असंप्रज्ञात-समाधि'
होती है। इन दोनों समाधियोंमें भेद यह है कि जबतक
ध्येय, ध्येयका नाम और नाम-नामीका सम्बन्ध- ये तीनों
चीजें रहती हैं, तबतक वह 'संप्रज्ञात-समाधि' होती है।
इसीको चित्तकी 'एकाग्र' अवस्था कहते हैं। परन्तु जब
नामकी स्मृति न रहकर केवल नामी (ध्येय) रह जाता है,
तब वह 'असंप्रज्ञात-समाधि' होती है। इसीको चित्तकी
'निरुद्ध' अवस्था कहते हैं।
निरुद्ध अवस्थाकी समाधि दो तरहकी होती है-
सबीज और निर्बीज। जिसमें संसारकी सूक्ष्म वासना रहती
है, वह 'सबीज समाधि' कहलाती है। सूक्ष्म वासनाके
कारण सबीज समाधिमें सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं। ये
सिद्धियाँ सांसारिक दृष्टिसे तो ऐश्वर्य हैं, पर पारमार्थिक