भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 451

४५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ६ ]

नाम भी योग है। वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके संयोगसे होनेवाले जितने भी सुख हैं, वे सब दुःखोंके कारण अर्थात् दुःख पैदा करनेवाले हैं (गीता—पाँचवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। अतः संयोगमें ही दुःख होता है, वियोगमें नहीं। वियोग—(संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद) में जो सुख है, उस सुखका वियोग नहीं होता, क्योंकि वह नित्य है। जब संयोगमें भी वियोग है और वियोगमें भी वियोग है तो वियोग ही नित्य हुआ। इस नित्य वियोगको ही गीता ‘योग’ कहती है। परमात्मतत्त्व ‘है’-रूप और संसार ‘नहीं’-रूप है। एक मार्मिक बात है कि ‘है’ को देखनेसे शुद्ध ‘है’ नहीं दीखता, पर ‘नहीं’ को ‘नहीं’-रूपसे देखनेपर शुद्ध ‘है’ दीखता है! कारण कि ‘है’ को देखनेमें मन-बुद्धि लगायेंगे, वृत्ति लगायेंगे तो ‘है’ के साथ वृत्तिरूप ‘नहीं’ भी मिला रहेगा। परन्तु ‘नहीं’ को ‘नहीं’-रूपसे देखनेपर वृत्ति भी ‘नहीं’ में चली जायगी और शुद्ध ‘है’ शेष रह जायगा; जैसे—कूड़ा-करकट दूर करनेपर उसके साथ झाडूका भी त्याग हो जाता है और मकान शेष रह जाता है। तात्पर्य है कि ‘परमात्मा सबमें परिपूर्ण हैं’—इसका मनसे चिन्तन करनेपर, बुद्धिसे निश्चय करनेपर वृत्तिके साथ हमारा सम्बन्ध बना रहेगा। परन्तु ‘संसारका प्रतिक्षण वियोग हो रहा है’—इस प्रकार संसारको अभावरूपसे देखनेपर संसार और वृत्ति—दोनोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा और भावरूप शुद्ध परमात्मतत्त्व स्वतः शेष रह जायगा।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने जिस योग—(साध्यरूप समता-) का वर्णन किया था, उसी योगकी प्राप्तिके लिये अब आगेके श्लोकसे निर्गुण-निराकारके ध्यानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वान्शेषतः।

मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥

सङ्कल्पप्रभवान्=संकल्पसे उत्पन्न होनेवालीअशेषतः= सर्वथाएव= ही
सर्वान्= सम्पूर्णत्यक्त्वा= त्याग करके (और)इन्द्रियग्रामम्= इन्द्रिय-समूहको
कामान्= कामनाओंकामनसा= मनसेसमन्ततः= सभी ओरसे
विनियम्य= हटाकर।

व्याख्या —[जो स्थिति कर्मफलका त्याग करनेवाले कर्मयोगीकी होती है (छठे अध्यायके पहलेसे नवें श्लोकतक), वही स्थिति सगुण-साकार भगवान्का ध्यान करनेवालेकी (छठे अध्यायका चौदहवाँ-पन्द्रहवाँ श्लोक) तथा अपने स्वरूपका ध्यान करनेवाले ध्यानयोगीकी भी होती है (छठे अध्यायके अठारहवेंसे तेईसवें श्लोकतक)। अब निर्गुण-निराकारका ध्यान करनेवालेकी भी वही स्थिति होती है—यह बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण कहते हैं।]

‘सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वान्शेषतः’ —सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिको लेकर मनमें जो तरह-तरहकी स्फुरणाएँ होती हैं, उन स्फुरणाओंमेंसे जिस स्फुरणामें प्रियता, सुन्दरता और आवश्यकता दीखती है, वह स्फुरणा ‘संकल्प’ का रूप धारण कर लेती है। ऐसे ही जिस स्फुरणामें ‘ये वस्तु, व्यक्ति आदि बड़े खराब हैं, ये हमारे उपयोगी नहीं हैं’—ऐसा विपरीत भाव पैदा हो जाता है,

वह स्फुरणा भी ‘संकल्प’ बन जाती है। संकल्पसे ‘ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं चाहिये’—यह ‘कामना’ उत्पन्न होती है। इस प्रकार संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली कामनाओंका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये।

यहाँ ‘कामान्’ पद बहुवचनमें आया है, फिर भी इसके साथ ‘सर्वान्’ पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी और किसी भी तरहकी कामना नहीं रहनी चाहिये।

‘अशेषतः’ पदका तात्पर्य है कि कामनाका बीज (सूक्ष्म संस्कार) भी नहीं रहना चाहिये। कारण कि वृक्षके एक बीजसे ही मीलौतकका जंगल पैदा हो सकता है। अतः बीजरूप कामनाका भी त्याग होना चाहिये।

‘मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः’ —[जिन इन्द्रियोंसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंका अनुभव होता है, भोग होता है, उन इन्द्रियोंके समूहका मनके द्वारा अच्छी तरहसे नियमन कर ले अर्थात् मनसे इन्द्रियोंको उनके अपने-अपने विषयोंसे हटा ले।]