भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

४५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ६ ]

‘न किञ्चिदपि चिन्तयेत्’—इसको ‘चुप साधन’, ‘मूक सत्संग’ और अचिन्त्यका ध्यान’ भी कहते हैं। इसमें न तो स्थूलशरीरकी क्रिया है, न सूक्ष्मशरीरका चिन्तन है और न कारण शरीरकी स्थिरता है। इसमें इन्द्रियाँ भी चुप हैं, मन भी चुप है, बुद्धि भी चुप है अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी कोई क्रिया नहीं है। सभी चुप हैं, कोई बोलता नहीं! जो देखना था वह देख लिया, सुनना था वह सुन लिया, बोलना था वह बोल लिया, करना था वह कर लिया, अब कुछ भी देखने, सुनने, बोलने, करने आदिकी रुचि नहीं रही—ऐसा होनेपर ही ‘चुप साधन’ होता है। यह ‘चुप साधन’ समाधिसे भी ऊँचा है; क्योंकि इसमें बुद्धि और अहम्से सम्बन्ध-विच्छेद है। समाधिमें तो लय, विश्लेष, कषाय और रसास्वाद—ये चार दोष (विघ्न) रहते हैं, पर चुप साधनमें ये दोष नहीं रहते। चुप साधन वृत्तिरहित है।

सम्बन्ध—पूर्वोक्त प्रकारसे निर्विकल्प स्थिति न हो तो क्या करे—इसके लिये आगेके श्लोकमें अभ्यास बताते हैं।

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।

ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥

अस्थिरम् | = (यह) अस्थिर (और) | यतः, यतः | = जहाँ-जहाँ | एतत् | = इसको ---|---|---|---|---|--- चञ्चलम् | = चंचल | निश्चरति | = विचरण करता है, | आत्मनि | = (एक) परमात्मामें मनः | = मन | ततः, ततः | = वहाँ-वहाँसे | एव | = ही | | नियम्य | = हटाकर | वशम्, नयेत् | = भलीभाँति लगाये *

व्याख्या —‘यतो यतो निश्चरति .....आत्मन्येव वशं नयेत्’—साधकने जो ध्येय बनाया है, उसमें यह मन टिकता नहीं, ठहरता नहीं। अतः इसको अस्थिर कहा गया है। यह मन तरह-तरहके सांसारिक भोगोंका, पदार्थोंका चिन्तन करता है। अतः इसको ‘चंचल’ कहा गया है। तात्पर्य है कि यह मन न तो परमात्मामें स्थिर होता है और न संसारको ही छोड़ता है। इसलिये साधकको चाहिये कि यह मन जहाँ-जहाँ जाय, जिस-जिस कारणसे जाय, जैसे-जैसे जाय और जब-जब जाय, इसको वहाँ-वहाँसे, उस-उस कारणसे वैसे-वैसे और तब-तब हटाकर परमात्मामें लगाये। इस अस्थिर और चंचल मनका नियमन करनेमें सावधानी रखे, ढिलाई न करे।

मनको परमात्मामें लगानेका तात्पर्य है कि जब यह पता लगे कि मन पदार्थोंका चिन्तन कर रहा है, तभी ऐसा विचार करे कि चिन्तनकी वृत्ति और उसके विषयका आधार और प्रकाशक परमात्मा ही हैं। यही परमात्मामें मन लगाना है।

परमात्मामें मन लगानेकी युक्तियाँ

(१) मन जिस किसी इन्द्रियके विषयमें, जिस किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति आदिमें चला जाय अर्थात् उसका चिन्तन करने लग जाय, उसी समय उस विषय आदिसे मनको हटाकर अपने ध्येय—परमात्मामें लगाये।

फिर चला जाय तो फिर लाकर परमात्मामें लगाये। इस प्रकार मनको बार-बार अपने ध्येयमें लगाता रहे।

(२) जहाँ-जहाँ मन जाय, वहाँ-वहाँ ही परमात्माको देखे। जैसे गंगाजी याद आ जायें, तो गंगाजीके रूपमें परमात्मा ही हैं, गाय याद आ जाय, तो गायरूपसे परमात्मा ही हैं—इस तरह मनको परमात्मामें लगाये। दूसरी दृष्टिसे, गंगाजी आदिमें सत्तारूपसे परमात्मा-ही-परमात्मा हैं, क्योंकि इनसे पहले भी परमात्मा ही थे, इनके मिटनेपर भी परमात्मा ही रहेंगे और इनके रहते हुए भी परमात्मा ही हैं—इस तरह मनको परमात्मामें लगाये।

(३) साधक जब परमात्मामें मन लगानेका अभ्यास करता है, तब संसारकी बातें याद आती हैं। इससे साधक घबरा जाता है कि जब मैं संसारका काम करता हूँ, तब इतनी बातें याद नहीं आतीं, इतना चिन्तन नहीं होता; परन्तु जब परमात्मामें मन लगानेका अभ्यास करता हूँ, तब मनमें तरह-तरहकी बातें याद आने लगती हैं! पर ऐसा समझकर साधकको घबराना नहीं चाहिये; क्योंकि जब साधकका उद्देश्य परमात्माका बन गया, तो अब संसारके चिन्तनके रूपमें भीतरसे कूड़ा-कचरा निकल रहा है, भीतरसे सफाई हो रही है। तात्पर्य है कि सांसारिक कार्य करते समय भीतर जमा हुए पुराने संस्कारोंको बाहर

  • गीताभरमें अभ्यासका स्वरूप स्पष्टरूपसे इसी श्लोकमें देखनेको मिलता है।