श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 461, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें४६० * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ६
दीखता है। एकरूप रहनेवाला है, पर प्राणी उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं।
इस श्लोकमें प्राणियोंमें तो अपनेको स्थित बताया है, इस श्लोकका तात्पर्य यह हुआ कि व्यवहारमें तो
पर अपनेमें प्राणियोंको स्थित नहीं बताया। ऐसा कहनेका प्राणियोंके साथ अलग-अलग बर्ताव होता है, परन्तु
तात्पर्य है कि प्राणियोंमें तो अपनी सत्ता है, पर अपनेमें अलग-अलग बर्ताव होनेपर भी उस समदर्शी योगीकी
प्राणियोंकी सत्ता नहीं है। कारण कि स्वरूप तो सदा स्थितिमें कोई फर्क नहीं पड़ता।
सम्बन्ध-भगवान्ने चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें सगुण-साकारका ध्यान करनेवाले जिस भक्तियोगीका वर्णन किया
था, उसके अनुभवकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
य: = जो (भक्त) मयि = मुझमें न, प्रणश्यामि = अदृश्य नहीं होता
सर्वत्र = सबमें सर्वम् = सबको च = और
माम् = मुझे पश्यति = देखता है, स: = वह
पश्यति = देखता है तस्य = उसके लिये मे = मेरे लिये
च = और अहम् = मैं न, प्रणश्यति = अदृश्य नहीं होता।
व्याख्या-'यो मां पश्यति सर्वत्र'-जो भक्त सब परन्तु जब उन्होंने अपने-अपने बालकोंको देखा, तब
देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, राक्षस, उनका गुस्सा शान्त हो गया और स्नेह उमड़ पड़ा। वे
पदार्थ, परिस्थिति, घटना आदिमें मेरेको देखता है। जैसे, बालकोंको हृदयसे लगाने लगे, उनका माथा सूँघने लगे।
ब्रह्माजी जब बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये, इस लीलाको देखकर दाऊ दादाने सोचा कि यह क्या बात
तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन है; उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो उनको बछड़ों और
गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं, प्रत्युत उनके बेंत, ग्वालबालोंके रूपमें भगवान् श्रीकृष्ण ही दिखायी दिये।
सींग, बाँसुरी, वस्त्र, आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही ऐसे ही भगवान्का सिद्ध भक्त सब जगह भगवान्को ही
बन गये*। यह लीला एक वर्षतक चलती रही, पर देखता है अर्थात् उसकी दृष्टिमें भगवत्सत्ताके सिवाय दूसरी
किसीको इसका पता नहीं चला। बछड़ोंमेंसे कई बछड़े तो किंचिन्मात्र भी सत्ता नहीं रहती।
केवल दूध ही पीनेवाले थे, इसलिये वे घरपर ही रहते थे 'सर्वं च मयि पश्यति'-और जो भक्त देश, काल,
और बड़े बछड़ोंको भगवान् श्रीकृष्ण अपने साथ वनमें ले वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिको मेरे ही अन्तर्गत
जाते थे। एक दिन दाऊ दादा (बलरामजी) ने देखा कि देखता है। जैसे, गीताका उपदेश देते समय अर्जुनके द्वारा
छोटे बछड़ोंवाली गायें भी अपने पहलेके (बड़े) बछड़ोंको प्रार्थना करनेपर भगवान् अपना विश्वरूप दिखाते हुए कहते
देखकर उनको दूध पिलानेके लिये हुंकार मारती हुई दौड़ हैं कि चराचर सारे संसारको मेरे एक अंशमें स्थित
पड़ीं। बड़े गोपोंने उन गायोंको बहुत रोका, पर वे रुकी देख-'इहै कस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्। मम
नहीं। इससे गोपोंने उन गायोंपर बहुत गुस्सा आ गया। देहे ........' (११।७), तो अर्जुन भी कहते हैं कि मैं
- यावद्वत्सपवत्सकल्पकवपुर्यावत्त्वराड्व्ययादिकं यावद्दिष्टविषाणवेणुदलशिगायावद्विभूषाम्बरम्।
यावच्छीलगुणाभिधाकृतिकवियो यावद्विहारादिकं सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदज: सर्वस्वरूपो बभौ॥
(श्रीमद्भा० १०।१३।१९)
'वे बालक और बछड़े संख्यामें जितने थे, जितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे, उनके हाथ-पैर आदि जैसे-जैसे थे, उनके
पास जितनी और जैसी छड़ियाँ, सींग, बाँसुरी, पत्ते और छींके थे, जैसे और जितने वस्त्राभूषण थे, उनके शील, स्वभाव,
गुण, नाम, रूप और अवस्थाएँ जैसी थीं, जिस प्रकार वे खाते-पीते, चलते आदि थे, ठीक वैसे ही और उतने ही रूपोंमें सर्वस्वरूप
भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उस समय 'यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुरूप है'-यह वेदवाणी मानो मूर्तिमती होकर प्रकट हो गयी।