भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक ३२ ]

  • साधक-संजीवनी *

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भगवान्में ही रहते हैं; परन्तु उनके अन्तःकरणमें संसारकी सत्ता और महत्ता रहनेसे वे भगवान्में अपनी स्थिति जानते नहीं, मानते नहीं। अतः भगवान्में बरतते हुए भी, भगवान्में रहते हुए भी उनका बर्ताव संसारमें ही हो रहा है अर्थात् उन्होंने जगत्में अहंता-ममता करके जगत्को धारण कर रखा है—‘यथेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। वे

परिशिष्ट भाव —भक्त सम्पूर्ण जगत्को परमात्माका ही स्वरूप देखता है। उसकी दृष्टिमें एक परमात्माके सिवाय और किसीकी सत्ता नहीं रहती। उसके लिये द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—तीनों ही परमात्मस्वरूप हो जाते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। इसलिये जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन किया जाय, ऐसे ही उस भक्तका सब बर्ताव परमात्मामें ही होता है। जैसे शरीरमें तादात्म्यवाला व्यक्ति सब क्रिया करते हुए शरीरमें ही रहता है, ऐसे ही भक्त सब क्रिया करते हुए भी परमात्मामें ही रहता है।

आगे तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने ज्ञानयोगीके लिये कहा है—‘सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते’ (१३।२३) और यहाँ भक्तके लिये कहा है—‘सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।’ तात्पर्य यह हुआ कि ज्ञानमार्गमें तो जन्म-मरण मिट जाता है, मुक्ति हो जाती है, पर भक्तिमार्गमें जन्म-मरण मिटकर भगवान्से अभिन्नता होती है, आत्मीयता होती है। इसी भावको गीतामें इस प्रकार भी कहा गया है—‘तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति’ (६।३०), ‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः’ (७।१७), ‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम्’ (७।१८), ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्’ (९।२९)। ज्ञानमार्गमें तो सूक्ष्म अहम्की गन्ध रहनेसे दार्शनिक मतभेद रह सकता है, पर भक्तिमार्गमें भगवान्से आत्मीयता होनेपर सूक्ष्म अहम्की गन्ध तथा उससे होनेवाला दार्शनिक मतभेद नहीं रहता। ‘न स भूयोऽभिजायते’ में स्वरूपमें स्थितिका अनुभव होनेपर केवल स्वयं (स्वरूप) रहता है और ‘स योगी मयि वर्तते’ में केवल भगवान् रहते हैं, स्वयं (योगी) नहीं रहता अर्थात् स्वयं योगीरूप नहीं रहता, प्रत्युत भगवत्स्वरूप रहता है।

सम्बन्ध—भक्त सब बर्ताव करते हुए भी मेरेमें कैसे बर्ताव करता है—यह आगेके श्लोकमें बताते हैं।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥

अर्जुन= हे अर्जुन!समम्= समान(भी समान)
यः= जो (भक्त)पश्यति= देखता हैदेखता है),
आत्मौपम्येन= अपने शरीरकी उपमासेवा= औरसः = वह
सर्वत्र= सब जगहसुखम्= सुखपरमः = परम
(मुझे)यदि, वा= अथवायोगी = योगी
दुःखम्= दुःखकोमतः = माना गया है।

व्याख्या —‘आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन’—साधारण मनुष्य जैसे अपने शरीरमें अपनी स्थिति देखता है, तो उसके शरीरके किसी अंगमें किसी तरहकी पीड़ा हो—ऐसा वह नहीं चाहता, प्रत्युत सभी अंगोंका समानरूपसे आराम चाहता है। ऐसे ही सब प्राणियोंमें भगवान्को समान देखनेवाला भक्त सभी प्राणियोंका समानरूपसे आराम चाहता है। उसके सामने कोई दुःखी

जगत्को भगवान्का स्वरूप न समझकर अर्थात् जगत् समझकर बर्ताव करते हैं। वे कहते भी हैं कि हम तो संसारी आदमी हैं, हम तो संसारमें रहनेवाले हैं। परन्तु भगवान्का भक्त इस बातको जानता है कि यह सब संसार वासुदेवरूप है। अतः वह भक्त हरदम भगवान्में ही रहता है और भगवान्में ही बर्ताव करता है।

‘सर्वत्र’ कहनेका तात्पर्य है कि उसके द्वारा वर्ण,