श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
| अहम् | = मैं | स्थिराम् | = स्थिर | न | = नहीं |
|---|---|---|---|---|---|
| एतस्य | = इस योगकी | स्थितिम् | = स्थिति | पश्यामि | = देखता हूँ। |
व्याख्या —[मनुष्यके कल्याणके लिये भगवान्ने गीतामें खास बात बतायी कि सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिको लेकर चित्तमें समता रहनी चाहिये। इस समतासे मनुष्यका कल्याण होता है। अर्जुन पापोंसे डरते थे तो उनके लिये भगवान्ने कहा कि 'जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर तुम युद्ध करो, फिर तुम्हारेको पाप नहीं लगेगा' (गीता—दूसरे अध्यायका अङ्तीसर्वां श्लोक)। जैसे दुनियामें बहुत-से पाप होते रहते हैं, पर वे पाप हमें नहीं लगते; क्योंकि उन पापोंमें हमारी विषम-बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत समबुद्धि रहती है। ऐसे ही समबुद्धिपूर्वक सांसारिक काम करनेसे कर्मोंसे बन्धन नहीं होता। इसी भावसे भगवान्ने इस अध्यायके आरम्भमें कहा है कि जो कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है। इसी कर्मफल-त्यागकी सिद्धि भगवान्ने 'समता' बतायी (छठे अध्यायका नवों श्लोक)। इस समताकी प्राप्तिके लिये भगवान्ने दसवें श्लोकसे बत्तीसवें श्लोकतक ध्यानयोगका वर्णन किया। इसी ध्यानयोगके वर्णनका लक्ष्य
करके अर्जुन यहाँ अपनी मान्यता प्रकट करते हैं।]
'योऽयं योगस्तव्या प्रोक्तः साम्येन' —यहाँ अर्जुनने जो अपनी मान्यता बतायी है, वह पूर्वश्लोकको लेकर नहीं है, प्रत्युत ध्यानके साधनको लेकर है। कारण कि बत्तीसवों श्लोक ध्यानयोगद्वारा सिद्ध पुरुषका है और सिद्ध पुरुषकी समता स्वतः होती है। इसलिये यहाँ 'यः' पदसे इस प्रकरणसे पहले कहे हुए योग-(समता-) का संकेत है और 'अयम्' पदसे दसवें श्लोकसे अट्ठाईसवें श्लोकतक कहे हुए ध्यानयोगके साधनका संकेत है।
'एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम्' —इन पदोंसे अर्जुनका यह आशय मालूम देता है कि कर्मयोगसे तो समताकी प्राप्ति सुगम है, पर यहाँ जिस ध्यानयोगसे समताकी प्राप्ति बतायी है, मनकी चंचलताके कारण उस ध्यानमें स्थिर स्थिति रहना मुझे बड़ा कठिन दिखायी देता है। तात्पर्य है कि जबतक मनकी चंचलताका नाश नहीं होगा, तबतक ध्यानयोग सिद्ध नहीं होगा और ध्यानयोग सिद्ध हुए बिना समताकी प्राप्ति नहीं होगी।
सम्बन्ध —जिस चंचलताके कारण अर्जुन अपने मनकी दृढ़ स्थिति नहीं देखते, उस चंचलताका आगेके श्लोकमें उदाहरणसहित स्पष्ट वर्णन करते हैं।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरेव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥
हि | = कारण कि | दृढम् | = दृढ़ (जिद्दी) | स्थित | ---|---|---|---|---|--- कृष्ण | = हे कृष्ण! | बलवत् | = (और) | वायोः | = वायुकी मनः | = मन | | बलवान् है। | इव | = तरह चञ्चलम् | = (बड़ा ही) | तस्य | = उसको | सुदुष्करम् | = अत्यन्त | चंचल, | निग्रहम् | = रोकना | | कठिन प्रमाथि | = प्रमथनशील, | अहम् | = मैं (आकाशमें) | मन्ये | = मानता हूँ।
व्याख्या —'चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्'—यहाँ भगवान्को 'कृष्ण' सम्बोधन देकर अर्जुन मानो यह कह रहे हैं कि हे नाथ! आप ही कृपा करके इस मनको खींचकर अपनेमें लगा लें, तो यह मन लग सकता है। मेरेसे तो इसका वशमें होना बड़ा कठिन है! क्योंकि यह मन बड़ा ही चंचल है। चंचलताके साथ-साथ यह 'प्रमाथि' भी है अर्थात् यह साधकको अपनी स्थितिसे विचलित कर देता है। यह बड़ा जिद्दी और बलवान् भी है।
भगवान्ने 'काम'-(कामना-) के रहनेके पाँच स्थान बताये हैं—इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, विषय और स्वयं (गीता—तीसरे अध्यायका चालीसवों तथा चौतीसवों और दूसरे अध्यायका उनसठवों श्लोक)। वास्तवमें काम स्वयंमें अर्थात् चिज्जड़-ग्रन्थिमें रहता है और इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा विषयोंमें इसकी प्रतीति होती है। काम जबतक स्वयंसे निवृत्त नहीं होता, तबतक यह काम समय-समयपर इन्द्रियों आदिमें प्रतीत होता रहता है। पर जब यह स्वयंसे निवृत्त हो