भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ६ ]

अर्जुन बोले—

कृष्ण= हे कृष्ण !अन्त समयमें अगर)योगसिद्धिको
श्रद्धया, उपेतः= जिसकी साधनमेंयोगात्= योगसे
श्रद्धा है,चलितमानसः= विचलितमनाकाम्
अयतिः= पर जिसका प्रयत्नहो जाय (तो)
शिथिल है, (वहयोगसंसिद्धिम्= (वह)गच्छति

व्याख्या—‘अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्छलित-मानसः’— ‘जिसकी साधनमें अर्थात् जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदिमें रुचि है, श्रद्धा है और उनको करता भी है, पर अन्तःकरण और बहिःकरण वशमें न होनेसे साधनमें शिथिलता है, तत्परता नहीं है। ऐसा साधक अन्तसमयमें संसारमें राग रहनेसे, विषयोंका चिन्तन होनेसे अपने साधनसे विचलित हो जाय, अपने ध्येयपर स्थिर न रहे तो फिर उसकी क्या गति होती है?

‘अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति’— विषयासक्ति, असावधानीके कारण अन्तकालमें जिसका मन विचलित हो गया अर्थात् साधनासे हट गया और इस कारण उसको योगकी संसिद्धि—परमात्माकी प्राप्ति नहीं हुई तो फिर वह किस गतिको प्राप्त होता है?

परिशिष्ट भाव— करणसापेक्ष साधनमें मनको साथ लेकर स्वरूपमें स्थिति होती है—‘यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते’ (गीता ६।१८)। अतः मनके साथ सम्बन्ध रहनेसे विचलितमना होकर योगभ्रष्ट होनेकी सम्भावना रहती है। कारणको अपना माननेसे ही करणसापेक्ष साधन होता है। ध्यानयोगी मन (करण)—को अपना मानकर उसको परमात्मामें लगाता है। मन लगानेसे ही वह योगभ्रष्ट होता है। अतः योगभ्रष्ट होनेमें करणसापेक्षता कारण है। यह करणसापेक्षता कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही साधनोंमें नहीं है।

ध्यानयोगीका पुनर्जन्म होता है—मनके विचलित होनेसे अर्थात् अपने साधनसे भ्रष्ट होनेसे, पर कर्मयोगी अथवा ज्ञानयोगीका पुनर्जन्म होता है—सांसारिक आसक्ति रहनेसे। भक्तियोगमें भगवान्का आश्रय रहनेसे भगवान् अपने भक्तकी विशेष रक्षा करते हैं—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ (गीता ९।२२), ‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि’ (गीता १८।५८)।

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।

अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥

महाबाहो= हे महाबाहो !विमूढः= मोहित अर्थात्कच्छात्= क्या
अप्रतिष्ठः= संसारकेविचलितछिन्नाभ्रम्= छिन्न-भिन्न
आश्रयसेउभयविभ्रष्टः= (—इसबादलकी
रहित (और)तरह) दोनोंइव= तरह
ब्रह्मणः= परमात्मप्राप्तिकेओरसे भ्रष्टन, नश्यति= नष्ट तो नहीं हो
पथि= मार्गमेंहुआ साधकजाता ?

व्याख्या—[अर्जुनने पूर्वोक्त श्लोकमें ‘कां गतिं कृष्ण गच्छति’ कहकर जो बात पूछी थी, उसीका इस श्लोकमें

खुलासा पूछते हैं।]

‘अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि’— वह