श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ६ ]
एतन्मे संशयं कृष्ण छेतुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥
| कृष्ण | = हे कृष्ण ! | छेतुम् | = छेदन करनेके लिये | छेत्ता | = छेदन करनेवाला |
|---|---|---|---|---|---|
| मे | = मेरे | अर्हसि | = (आप ही) योग्य हैं; | त्वदन्यः | = आपके सिवाय |
| एतत् | = इस | हि | = क्योंकि | दूसरा | |
| संशयम् | = सन्देहका | अस्य | = इस | न, उपपद्यते | = कोई हो नहीं |
| अशेषतः | = सर्वथा | संशयस्य | = संशयका | सकता । |
व्याख्या— ‘एतन्मे संशयं कृष्ण छेतुमर्हस्यशेषतः’—परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेसे साधक पापकर्मोंसे तो सर्वथा रहित हो गया, इसलिये वह नरकोंमें तो जा ही नहीं सकता और स्वर्गका ध्येय न रहनेसे स्वर्गमें भी जा नहीं सकता। मनुष्ययोनियमें आनेका उसका उद्देश्य नहीं है, इसलिये वह उसमें भी नहीं आ सकता और परमात्मप्राप्तिके साधनसे भी विचलित हो गया। ऐसा साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता? यह मेरा संशय है।
‘त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते’ —इस संशयका सर्वथा छेदन करनेवाला अन्य कोई हो नहीं सकता। इसका तात्पर्य है कि शास्त्रकी कोई गुत्थी हो, शास्त्रका कोई गहन विषय हो, कोई ऐसी कठिन पंक्ति हो, जिसका अर्थ न लगता हो, तो उसको शास्त्रोंका ज्ञाता
कोई विद्वान् भी समझा सकता है। परन्तु योगभ्रष्टकी क्या गति होती है? इसका उत्तर वह नहीं दे सकता। हाँ, योगी कुछ हदतक इसको जान सकता है, पर वह सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति-आगतिको अर्थात् जाने और आनेको नहीं जान सकता; क्योंकि वह ‘युंजान योगी’ है अर्थात् अभ्यास करके योगी बना है। अतः वह वहीतक जान सकता है, जहाँतक उसकी जाननेकी हद है। परन्तु आप तो ‘युक्त योगी’ हैं अर्थात् आप बिना अभ्यास, परिश्रमके सर्वत्र सब कुछ जाननेवाले हैं। आपके समान जानकार कोई हो सकता ही नहीं। आप साक्षात् भगवान् हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति-आगतिको जाननेवाले हैं*। अतः इस योगभ्रष्टके गतिविषयक प्रश्नका उत्तर आप ही दे सकते हैं। आप ही मेरे इस संशयको दूर कर सकते हैं।
परिशिष्ट भाव— अर्जुनको भगवान् श्रीकृष्णकी भगवत्तापर विश्वास था, तभी यहाँ वे योगभ्रष्टकी गतिके विषयमें प्रश्न करते हैं और कहते हैं कि इस बातको आपके सिवाय दूसरा कोई बता नहीं सकता। भगवान् श्रीकृष्णकी भगवत्तापर विश्वास होनेके कारण ही उन्होंने एक अक्षौहिणी सशस्त्र नारायणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्को ही स्वीकार किया था !
सम्बन्ध— अङ्गीसर्वे श्लोकमें अर्जुनने शंका की थी कि संसारसे और साधनसे च्युत हुए साधकका कहीं पतन तो नहीं हो जाता? उसका समाधान करनेके लिये भगवान् आगेका श्लोक कहते हैं।
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिददुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
श्रीभगवान् बोले—
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | न | = न तो | (और) | |
|---|---|---|---|---|---|
| तस्य | = उसका | इह | = इस लोकमें | न | = न |
- उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥
(विष्णुपुराण ६।५।७८; नारदपुराण, पूर्व० ४६।२१)
‘जो सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयको, गति और अगतिको एवं विद्या और अविद्याको जानता है, वही भगवान् कहलानेयोग्य है।’