भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ६ ]

पुनः साधन करनेके लिये प्रेरित करता रहता है, उकसाता रहता है। इससे उस योगभ्रष्टके मनमें आती है कि मैं साधन करूँ। ऐसी मनमें क्यों आती है—इसका उसको पता नहीं लगता। जब श्रीमानोंके घरमें भोगोंके परवश होनेपर भी पूर्वजन्मका अभ्यास उसको जबर्दस्ती खींच लेता है (छठे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक) तब वह साधन उसको स्वर्ग आदिमें साधनके बिना चैनसे कैसे रहने देगा? अतः भगवान् उसको साधन करनेका मौका देनेके लिये शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म देते हैं।

जिनका धन शुद्ध कमाईका है, जो कभी पराया हक नहीं लेते, जिनके आचरण तथा भाव शुद्ध हैं, जिनके अन्तःकरणमें भोगोंका और पदार्थोंका महत्त्व, उनकी ममता नहीं है, जो सम्पूर्ण पदार्थ, घर, परिवार आदिको साधन सामग्री समझते हैं, जो भोगबुद्धिसे किसीपर अपना व्यक्तिगत आधिपत्य नहीं जमाते, वे 'शुद्ध श्रीमान्' कहे जाते हैं। जो धन और भोगोंपर अपना आधिपत्य जमाते हैं, वे अपनेको तो उन धन और पदार्थोंका मालिक मानते हैं, पर हो जाते हैं उनके गुलाम! इसलिये वे शुद्ध श्रीमान् नहीं हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें तो भगवान्ने अर्जुनके प्रश्नके 'अथवा' कहकर अपनी ही तरफसे दूसरे योगभ्रष्टकी बात कहते हैं।

अनुसार योगभ्रष्टकी गति बतायी। अब आगेके श्लोकमें

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्। एतद्भिर्दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥

अथवा= अथवा (वैराग्यवान् योगभ्रष्ट)एव= ही
धीमताम्= ज्ञानवान्भवति= जन्म लेता है।
योगिनाम्= योगियोंकेईदृशम्= इस प्रकारका
कुले= कुलमेंयत्= जो
एतत्= यह
जन्म= जन्म है, (यह)
लोके= संसारमें
हि= निःसन्देह
दुर्लभतरम्= बहुत ही दुर्लभ है।

व्याख्या —[साधन करनेवाले दो तरहके होते हैं—वासनासहित और वासनारहित। जिसको साधन अच्छा लगता है, जिसकी साधनमें रुचि हो जाती है और जो परमात्माकी प्राप्तिका उद्देश्य बनाकर साधनमें लग भी जाता है, पर अभी उसकी भोगोंमें वासना सर्वथा नहीं मिटी है, वह अन्तसमयमें साधनसे विचलित होनेपर योगभ्रष्ट हो जाता है, तो वह स्वर्गादि लोकोंमें बहुत वर्षांतक रहकर शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है। (इस योगभ्रष्टकी बात पूर्वश्लोकमें बता दी)। दूसरा साधक, जिसके भीतर वासना नहीं है, तीव्र वैराग्य है और जो परमात्माका उद्देश्य रखकर तेजीसे साधनमें लगा है, पर अभी पूर्णता प्राप्त नहीं हुई है, वह किसी विशेष कारणसे योगभ्रष्ट हो जाता है तो उसको स्वर्ग आदिमें नहीं जाना पड़ता, प्रत्युत वह सीधे ही योगियोंके कुलमें जन्म लेता है (इस योगभ्रष्टकी बात इस श्लोकमें बता रहे हैं)।]

'अथवा' —तुमने जिस योगभ्रष्टकी बात पूछी थी, वह तो मैंने कह दी। परन्तु जो संसारसे विरक्त होकर,

संसारसे सर्वथा विमुक्त होकर साधनमें लगा हुआ है, वह भी किसी कारणसे, किसी परिस्थितिसे तत्काल मर जाय और उसकी वृत्ति अन्तसमयमें साधनमें न रहे, तो वह भी योगभ्रष्ट हो जाता है। ऐसे योगभ्रष्टकी गतिको मैं यहाँ कह रहा हूँ।

'योगिनामेव कुले भवति धीमताम्' —जो परमात्म-तत्त्वको प्राप्त कर चुके हैं, जिनकी बुद्धि परमात्मतत्त्वमें स्थिर हो गयी है, ऐसे तत्त्वज्ञ जीवनमुक्त बुद्धिमान् योगियोंके कुलमें वह वैराग्यवान् योगभ्रष्ट जन्म लेता है।

'कुले' कहनेका तात्पर्य है कि उसका जन्म साक्षात् जीवनमुक्त योगी महापुरुषके कुलमें ही होता है; क्योंकि श्रुति कहती है कि उस ब्रह्मज्ञानीके कुलमें कोई भी ब्रह्मज्ञानसे रहित नहीं होता अर्थात् सब ब्रह्मज्ञानी ही होते हैं—'नास्याब्रह्मवित् कुले भवति' (मुण्डक० ३।२।९)।

'एतद्भिर्दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्'* —उसका यह इस प्रकारका योगियोंके कुलमें जन्म होना इस लोकमें

  • यहाँ 'दुर्लभतर' शब्दमें 'तरप' प्रत्यय देनेका तात्पर्य है कि श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाले और योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवाले—इन दोनों योगभ्रष्टोंमेंसे योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवालेका जन्म अत्यन्त दुर्लभ है।