श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४७]
- साधक-संजीवनी *
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महिमा गायी है; उसके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं कि 'हे अर्जुन! तू योगी हो जा, राग-द्वेषसे रहित हो जा अर्थात् सब काम करते हुए भी जलमें कमलके पत्तेके तरह निलिप्त रह।' यही बात भगवान्ने आगे आठवें अध्यायमें भी कही है—'योगयुक्तो भवार्जुन' (८। २७)।
पाँचवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने प्रार्थना की थी कि
परिशिष्ट भाव —भोगीका विभाग अलग है और योगीका विभाग अलग है। भोगी योगी नहीं होता और योगी भोगी नहीं होता। जिनमें सकामभाव होता है, वे भोगी होते हैं और जिनमें निष्कामभाव होता है, वे योगी होते हैं। इसलिये सकामभाववाले तपस्वी, ज्ञानी और कर्मसे भी निष्कामभाववाला योगी श्रेष्ठ है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने योगीकी प्रशंसा करके अर्जुनको योगी होनेकी आज्ञा दी। परन्तु कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, भक्तियोगी आदिमेंसे कौन-सा योगी होना चाहिये—इसके लिये अर्जुनको स्पष्टरूपसे आज्ञा नहीं दी। इसलिये अब भगवान् आगेके श्लोकमें 'अर्जुन भक्तियोगी बने'—इस उद्देश्यसे भक्तियोगीकी विशेष महिमा कहते हैं।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावाम्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥
| सर्वेषाम् | = सम्पूर्ण | मद्गतेन | = मुझमें तल्लीन | सः | = वह |
|---|---|---|---|---|---|
| योगिनाम् | = योगियोंमें | हुए | मे | = मेरे | |
| अपि | = भी | अन्तरात्मना | = मनसे | मतः | = मतमें |
| यः | = जो | माम् | = मेरा | युक्ततमः | = सर्वश्रेष्ठ |
| श्रद्धावान् | = श्रद्धावान् भक्त | भजते | = भजन करता है, | योगी है। |
व्याख्या —'योगिनामपि सर्वेषाम्'—जिनमें जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी मुख्यता है, जो कर्मयोग, सांख्ययोग, हठयोग, मन्त्रयोग, लययोग आदि साधनोंके द्वारा अपने स्वरूपकी प्राप्ति-(अनुभव-) में ही लगे हुए हैं, वे योगी सकाम तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मियोंसे श्रेष्ठ हैं। परन्तु उन सम्पूर्ण योगियोंमें भी केवल मेरे साथ सम्बन्ध जोड़नेवाला भक्तियोगी सर्वश्रेष्ठ है।
'यः श्रद्धावान्' —जो मेरेपर श्रद्धा और विश्वास करता है अर्थात् जिसके भीतर मेरी ही सत्ता और महत्ता है, ऐसा वह श्रद्धावान् भक्त मेरेमें लगे हुए मनसे मेरा भजन करता है।
'मद्गतेनान्तरात्मना मां भजते' —मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं—इस प्रकार जब स्वयंका भगवान्में अपनापन हो जाता है, तब मन स्वतः ही भगवान्में लग जाता है, तल्लीन हो जाता है। जैसे विवाह होनेपर लड़कीका मन स्वाभाविक ही ससुरालमें लग जाता है, ऐसे ही भगवान्में अपनापन होनेपर भक्तका मन स्वाभाविक ही भगवान्में लग जाता है, मनको लगाना नहीं पड़ता। फिर खाते-पीते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते आदि
आप मेरे लिये एक निश्चित श्रेयकी बात कहिये। इसपर भगवान्ने सांख्ययोग, कर्मयोग, ध्यानयोगकी बातें बतायीं, पर इस श्लोकसे पहले कहीं भी अर्जुनको यह आज्ञा नहीं दी कि तुम ऐसे बन जाओ, इस मार्गमें लग जाओ। अब यहाँ भगवान् अर्जुनकी प्रार्थनाके उत्तरमें आज्ञा देते हैं कि 'तुम योगी हो जाओ'; क्योंकि यही तुम्हारे लिये एक निश्चित श्रेय है।
सभी क्रियाओंमें मन भगवान्का ही चिन्तन करता है,
भगवान्में ही लगा रहता है।
जो केवल भगवान्का ही हो जाता है, जिसका अपना
व्यक्तिगत कुछ नहीं रहता, उसकी साधन-भजन, जप-
कीर्तन, श्रवण-मनन आदि सभी पारमार्थिक क्रियाएँ; खाना-
पीना, चलना-फिरना, सोना-जागना आदि सभी शारीरिक
क्रियाएँ और खेती, व्यापार, नौकरी आदि जीविका-
सम्बन्धी क्रियाएँ भजन हो जाती हैं।
अनन्यभक्तके भजनका स्वरूप भगवान्ने ग्यारहवें
अध्यायके पचपनवें श्लोकमें बताया है कि वह भक्त मेरी
प्रसन्नताके लिये ही सभी कर्म करता है, सदा मेरे ही
परायण रहता है, केवल मेरा ही भक्त है, संसारका भक्त
नहीं है, संसारकी आसक्तिको सर्वथा छोड़ देता है और
सम्पूर्ण प्राणियोंमें वैरभावसे रहित हो जाता है।
'स मे युक्ततमो मतः' —संसारसे विमुख होकर
अपना उद्धार करनेमें लगनेवाले जितने योगी (साधक) हो
सकते हैं, वे सभी 'युक्त' हैं। जो सगुण-निराकारकी अर्थात्
व्यापकरूपसे सबमें परिपूर्ण परमात्माकी शरण लेते हैं, वे
सभी 'युक्ततर' हैं। परन्तु जो केवल मुझ सगुण भगवान्के