भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 500

श्लोक ४-५ * साधक-संजीवनी * ४९९

करे, उनके बिना चैनसे न रह सके तो भगवान्‌की प्राप्तिमें देरी नहीं है। कारण कि जो नित्यप्राप्त है, उसकी प्राप्तिमें क्या देरी? भगवान्‌ कोई वृक्ष तो हैं नहीं कि आज बोयेंगे और वर्षोंके बाद फल मिलेगा! वे तो सब देशमें, सब समयमें, सब वस्तुओंमें, सब अवस्थाओंमें, सब परिस्थितियोंमें ज्यों-के-त्यों विद्यमान हैं। हम ही उनसे विमुख हुए हैं, वे हमसे कभी विमुख नहीं हुए।

सम्बन्ध—दूसरे श्लोकमें भगवान्‌ने ज्ञान-विज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा की थी। उस प्रतिज्ञाके अनुसार अब भगवान्‌ ज्ञान-विज्ञान कहनेका उपक्रम करते हैं।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरैव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४॥ अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५॥

भूमिः = पृथ्वी, आपः = जल, अनलः = तेज, वायुः = वायु, खम् = आकाश (—ये पंचमहाभूत), च = और, मनः = मन, बुद्धिः = बुद्धि, एव = तथा, अहङ्कारः = अहंकार—

इति = इस प्रकार, इयम् = यह, अष्टधा = आठ प्रकारके, भिन्ना = भेदोंवाली, मे = मेरी, इयम् = यह, अपरा = अपरा, प्रकृतिः = प्रकृति है; तु = और, महाबाहो = हे महाबाहो!, इतः = इस अपरा प्रकृतिसे

अन्याम् = भिन्न, जीवभूताम् = जीवरूप बनी हुई, मे = मेरी, पराम् = परा, प्रकृतिम् = प्रकृतिको, विद्धि = जान, यया = जिसके द्वारा, इदम् = यह, जगत् = जगत्, धार्यते = धारण किया जाता है।

व्याख्या—[जो परिवर्तनशील है, कभी एकरूप नहीं रहता, उस जड़का ही भगवान्‌ने अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे 'क्षर' नामसे वर्णन किया है—'क्षरः सर्वाणि भूतानि' (१५।१६), फिर 'भूमिरापोऽनलो वायुः ............. प्रकृतिरष्टधा' (७।४)—इस श्लोकमें उसीको आठ भेदोंवाली 'अपरा प्रकृति' के नामसे कहा है और फिर 'महाभूता-न्यहङ्कारः......... पञ्च चेन्द्रियगोचराः' (१३।५)—इस श्लोकमें उसीके विस्तारसे चौबीस भेद बताये हैं।] 'भूमिरापोऽनलो वायुः ...... विद्धि मे पराम्'—परमात्मा सबके कारण हैं। वे प्रकृतिको लेकर सृष्टिकी रचना करते हैं*। जिस प्रकृतिको लेकर रचना करते हैं, उसका नाम 'अपरा प्रकृति' है और अपना अंश जो जीव है, उसको भगवान्‌ 'परा प्रकृति' कहते हैं। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड़ और परिवर्तनशील है तथा परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तनरहित है। प्रत्येक मनुष्यका भिन्न-भिन्न स्वभाव होता है। जैसे स्वभावको मनुष्यसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते, ऐसे ही परमात्माकी प्रकृतिको परमात्मासे अलग (स्वतंत्र) सिद्ध नहीं कर सकते। यह प्रकृति प्रभुका ही एक स्वभाव है; इसलिये इसका नाम 'प्रकृति' है। इसी प्रकार परमात्माका अंश होनेसे जीवको परमात्मासे भिन्न सिद्ध नहीं कर सकते; क्योंकि यह परमात्मा स्वरूप है। परमात्माका स्वरूप होनेपर भी केवल अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेके कारण इस जीवात्माको प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृतिके सम्बन्धसे अपनेमें कृति (करना) माननेके कारण ही यह जीवरूप है। अगर यह अपनेमें कृति न माने तो यह

  • कहीं तो प्रकृतिको लेकर भगवान्‌ रचना करते हैं (गीता—नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक) और कहीं भगवान्‌की अध्यक्षतामें प्रकृति रचना करती है (गीता—नवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)—इन दोनों ही रीतियोंसे गीतामें संसारकी रचनाका वर्णन आता है।