श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 505, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें५०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
नख और केश निष्प्राण होनेपर भी हमारे प्राणयुक्त शरीरसे अलग नहीं हैं, ऐसे ही अपरा प्रकृति जड़ होनेपर भी चेतन भगवान्से अलग नहीं है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। इस प्रकार जब अपरा और परा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्का स्वरूप हुईं तो फिर भगवान्के सिवाय क्या शेष रहा? कुछ भी शेष नहीं रहा—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। तात्पर्य है कि अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके सहित भगवान्का स्वरूप ‘समग्र’ है अर्थात् परा-अपरा, सत्-असत्, जड़-चेतन सब कुछ भगवान् ही हैं।
‘ययेदं धार्यते जगत्’ का तात्पर्य है कि संसार न तो भगवान्की दृष्टिमें है और न महात्माकी दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवकी दृष्टि-(मान्यता-) में है। भगवान्की दृष्टिमें सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९) और महात्माकी दृष्टिमें भी सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)। जीवने ही राग-द्वेषके कारण जगत्को अपनी बुद्धिमें धारण कर रखा है। इसी बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें ‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ पदोंसे कहा गया है। जगत्को सत्ता देनेसे ही राग-द्वेष पैदा होते हैं।
जीवने संसारकी सत्ता मान ली और सत्ता मानकर उसको महत्ता दे दी। महत्ता देनेसे कामना अर्थात् सुखभोगकी इच्छा पैदा हुई, जिससे जीव जन्म-मरणमें पड़ गया। तात्पर्य यह हुआ कि एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता माननेसे ही जीव संसार-बन्धनमें पड़ा है। अतः दूसरी सत्ता न माननेकी जिम्मेवारी जीवकी ही है। अगर वह संसारकी सत्ता न माने तो संसार है ही कहाँ?
भगवान्ने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंको अपरा (जड़) प्रकृति कहा है। अतः जैसे पृथ्वी जड़ और जाननेमें आनेवाली है, ऐसे ही अहम् भी जड़ और जाननेमें आनेवाला है। तात्पर्य है कि पृथ्वी, जल आदि आठों एक ही जातिके हैं। अतः जिस जातिकी पृथ्वी है, उसी जातिका अहम् भी है अर्थात् अहम् भी मिट्टीके ढेलेकी तरह जड़ और दूष्य है। अतः भगवान्ने अहम्को एतत्तासे कहा है; जैसे—‘एतद् यो वेत्ति’ (गीता १३।१)। ‘एतत्’ (यह) कभी ‘अहम्’ (मैं) नहीं होता; अतः अहम्को एतत्तासे कहनेका तात्पर्य है कि यह अपना स्वरूप नहीं है। परन्तु जब चेतन (जीव) इस अहम्के साथ अपना तादात्म्य मान लेता है, तब वह बँध जाता है—‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। इसीको चिञ्चदुग्रन्थि कहते हैं।
‘अहङ्कार इतीयं मे’—यह धातुरूप अहंकार तो अपरा प्रकृतिका (जड़) है, पर ‘मैं हूँ’—यह ग्रन्थिरूप अहंकार केवल अपरा प्रकृति नहीं है, प्रत्युत इसमें परा प्रकृति (चेतन) भी मिली हुई है। तत्त्वज्ञान होनेपर यह जन्म-मरण देनेवाला ग्रन्थिरूप अहंकार तो नहीं रहता, पर अपरा प्रकृतिका धातुरूप अहंकार रहता है।
क्रिया और पदार्थ न तो परा प्रकृतिमें हैं और न परमात्मामें हैं, प्रत्युत अपरा प्रकृतिमें हैं। अपरा प्रकृति क्रियारूप और पदार्थरूप है। परमात्मा प्रकृतिकी सहायतासे ही सृष्टि-रचना करते हैं। परा प्रकृति अर्थात् जीव क्रिया और पदार्थरूप अपरा प्रकृतिमें आसक्ति करके और उसका आश्रय लेकर बँध जाता है। अपराकी आसक्ति और उसका आश्रय लेना ही जगत्को धारण करना है। इसलिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें ही ‘मव्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः’ पदोंसे अपनेमें आसक्ति (प्रेम) करने और अपना आश्रय लेनेकी बात कही है। अगर जीव अपरा प्रकृतिमें आसक्ति न रखे और उसका आश्रय न ले तो वह ‘मुक्त’ हो जायगा। अगर वह भगवान्में आसक्ति (प्रेम) करे और उनका आश्रय ले तो वह ‘भक्त’ हो जायगा।
जगत्की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। बाँधनेवाला जगत् तो जीवने ही बना रखा है। जीव जगत्को धारण करता है, इसीसे सुख-दुःख होते हैं, बन्धन होता है, चौरासी लाख योनियाँ, भूत, प्रेत, पिशाच, देवता आदि योनियाँ तथा नरकोंकी प्राप्ति
१-पृथ्वी स्थूल है। पृथ्वीसे सूक्ष्म जल है। जलसे सूक्ष्म तेज है। तेजसे सूक्ष्म वायु है। वायुसे सूक्ष्म आकाश है। आकाशसे सूक्ष्म मन है। मनसे सूक्ष्म बुद्धि है। बुद्धिसे सूक्ष्म अहम् है। अपरा प्रकृतिमें अहम् सबसे सूक्ष्म है। इस प्रकार भगवान्ने स्थूलसे सूक्ष्म तक क्रमसे अपरा प्रकृतिका वर्णन किया है।
२-एक अनेकमें अनुगत हो तो उसे ‘जाति’ कहते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्—इन आठोंमें जातीय एकता तो है, पर स्वरूपकी एकता नहीं है अर्थात् जाति एक होनेपर भी इनका स्वरूप अलग-अलग है। इसीलिये इसको ‘अष्टधा’ कहा गया है। अपरा प्रकृतिका कार्य होनेसे यहाँ पृथ्वी, जल आदिको भी अपरा प्रकृति कहा गया है।