श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ७ ]
द्वारा देखा, सुना, पढ़ा, सोचा जाता है, वह सब-का-सब 'अपरा' है। परन्तु जो देखता, सुनता, पढ़ता, सोचता, जानता, मानता है, वह 'परा' है। परा और अपरा—दोनों ही भगवान्की शक्तियाँ होनेसे भगवान्से अभिन्न अर्थात् भगवत्स्वरूप ही हैं। अतः अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रूपमें एक भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है—'वासुदेवः सर्वम्' (७।१९), 'सदसच्चाहमर्जुन' (९।१९)। संसारके सभी दर्शन, मत-मतान्तर आचार्योंको लेकर हैं, पर 'वासुदेवः सर्वम्' किसी आचार्यका दर्शन, मत नहीं है, प्रत्युत साक्षात् भगवान्का अटल सिद्धान्त है, जिसके अन्तर्गत सभी दर्शन, मत-मतान्तर आ जाते हैं।
'अपरा' (जगत्) को स्वतन्त्र सत्ता जीवने ही दी है—'यदेदं धार्यते जगत्'। 'अपरा' भगवान्की है, पर उसको अर्थात् शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम्को अपना और अपने लिये मान लेनेसे ही जीव बन्धनमें पड़ा है। अतः साधकको अगर जगत् दीखता है तो यह उसकी व्यक्तित्व दृष्टि है। व्यक्तित्व दृष्टि सिद्धान्त नहीं होता। दीखना सीमित होता है, जबकि तत्त्व असीम है। जैसे, सूर्य थालीकी तरह दीखता है, पर वास्तवमें वह थालीके आकारका नहीं है, प्रत्युत पृथ्वीसे भी कई गुना अधिक बड़ा है!
अगर साधकको जगत् दीखता है तो उसको निष्कामभावपूर्वक जगत्की सेवा करनी चाहिये। जगत्को अपना और अपने लिये मानना तथा उससे सुख लेना ही असाधन है, बन्धन है। कारण कि हमारे पास शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि आदि जो कुछ भी है, वह सब जगत्का है और जगत्के लिये है। अतः जगत्की वस्तुको जगत्की सेवामें लगानेसे जगत् जगत्-रूपसे नहीं दीखेगा, प्रत्युत भगवत्स्वरूप दीखने लगेगा, जो कि वास्तवमें है। तात्पर्य है कि साधक चाहे जगत्को माने, चाहे आत्माको माने, चाहे परमात्माको माने, किसीको भी मानकर वह साधन कर सकता है और अन्तिम तत्त्व 'वासुदेवः सर्वम्' का अनुभव कर सकता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि परा प्रकृतिने अपरा प्रकृतिको धारण कर रखा है। उसीका स्पष्टीकरण करनेके लिये अब आगेका श्लोक कहते हैं।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥
| सर्वाणि | = सम्पूर्ण | प्रकृतियोंका | कृत्स्नस्य | = सम्पूर्ण |
|---|---|---|---|---|
| भूतानि | = प्राणियोंके | |||
| (उत्पन्न होनेमें) | संयोग ही कारण है— | जगतः | = जगत्का | |
| एतद्योनीनि | = अपरा और | |||
| परा—इन दोनों | इति = ऐसा | प्रभवः | = प्रभव | |
| उपधारय = तुम समझो। | तथा | = तथा | ||
| अहम् = मैं | प्रलयः | = प्रलय हूँ। |
व्याख्या —'एतद्योनीनि भूतानि'*—जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जंगम और वृक्ष, लता, घास आदि स्थावर प्राणी हैं, वे सब-के-सब मेरी अपरा और परा प्रकृतिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होते हैं।
तेरहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके सम्बन्धसे सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति बताया है। यही बात सामान्य रीतिसे चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी बताया है कि स्थावर, जंगम
योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले जितने शरीर हैं, वे सब प्रकृतिके हैं और उन शरीरोंमें जो बीज अर्थात् जीवात्मा है, वह मेरा अंश है। उसी बीज अर्थात् जीवात्माको भगवान्ने 'परा प्रकृति' (सातवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) और 'अपना अंश' (पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) कहा है।
'सर्वाणीत्युपधारय'—'स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक आदि सम्पूर्ण लोकोंके जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सब-के-सब अपरा और परा प्रकृतिके
- 'एतद्योनीनि भूतानि' पदोंका अर्थ है—'एते अपरा-परे योनी कारणे येषां तानि' अर्थात् 'अपरा और परा—ये दो प्रकृतियाँ जिनकी कारण हैं, ऐसे सम्पूर्ण प्राणी'।