श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
केशव | = हे केशव ! (मैं) | विपरीतानि | = विपरीत | हत्वा | = मारकर ---|---|---|---|---|--- निमित्तानि | = लक्षणों (शकुनों)-को | पश्यामि | = देख रहा हूँ (और) | श्रेयः | = श्रेय (लाभ) च | = भी | आहवे | = युद्धमें | च | = भी | | स्वजन्म | = स्वजनोंको | न | = नहीं | | | | अनुपश्यामि | = देख रहा हूँ।
व्याख्या —‘निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव’—हे केशव! मैं शकुनोंको१ भी विपरीत ही देख रहा हूँ। तात्पर्य है कि किसी भी कार्यके आरम्भमें मनमें जितना अधिक उत्साह (हर्ष) होता है, वह उत्साह उस कार्यको उतना ही सिद्ध करनेवाला होता है। परन्तु अगर कार्यके आरम्भमें ही उत्साह भंग हो जाता है, मनमें संकल्प-विकल्प ठीक नहीं होते, तो उस कार्यका परिणाम अच्छा नहीं होता। इसी भावसे अर्जुन कह रहे हैं कि अभी मेरे शरीरमें अवयवोंका शिथिल होना, कम्प होना, मुखका सूखना आदि जो लक्षण हो रहे हैं, ये व्यक्तिगत शकुन भी ठीक नहीं हो रहे हैं। इसके सिवाय आकाशसे उल्कापात होना, असमयमें ग्रहण लगना, भूकम्प होना, पशु-पक्षियोंका भयंकर बोली बोलना, चन्द्रमाके काले चिह्नका मिट-सा जाना, बादलोंसे रक्तकी वर्षा होना आदि जो पहले शकुन हुए हैं, वे भी ठीक नहीं हुए हैं। इस तरह अभीके और
पहलेके—इन दोनों शकुनोंकी ओर देखाता हूँ, तो मेरेको ये दोनों ही शकुन विपरीत अर्थात् भावी अनिष्टके सूचक दीखते हैं।
‘न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजन्माहवे’—युद्धमें अपने कुटुम्बियोंको मारनेसे हमें कोई लाभ होगा—ऐसी बात भी नहीं है। इस युद्धके परिणाममें हमारे लिये लोक और परलोक—दोनों ही हितकारक नहीं दीखते। कारण कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है। अतः कुलका नाश करनेसे हमें पाप ही लगेगा, जिससे नरकोंकी प्राप्ति होगी।
इस श्लोकमें ‘निमित्तानि पश्यामि’ और ‘श्रेयः अनुपश्यामि’१३—इन दोनों वाक्योंसे अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि मैं शकुनोंको देखूँ अथवा स्वयं विचार करूँ, दोनों ही रीतिसे युद्धका आरम्भ और उसका परिणाम हमारे लिये और संसारमात्रके लिये हितकारक नहीं दीखता।
सम्बन्ध —जिसमें न तो शुभ शकुन दीखते हैं और न श्रेय ही दीखता है, ऐसी अनिष्टकारक विजयको प्राप्त करनेकी अनिच्छा अर्जुन आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥ ३२ ॥
| कृष्ण | = हे कृष्ण ! (मैं) | च | = और, | किम् | = क्या लाभ ? |
|---|---|---|---|---|---|
| न | = न (तो) | सुखानि | = (न) सुखोंको | ||
| (ही चाहता हूँ) । | भोगैः | = भोगोंसे (क्या लाभ ?) | |||
| विजयम् | = विजय | गोविन्द | = हे गोविन्द ! | वा | = अथवा |
| काङ्क्षे | = चाहता हूँ, | नः | = हमलोगोंको | जीवितेन | = जीनेसे (भी) |
| न | = न | राज्येन | = राज्यसे | किम् | = क्या लाभ ? |
| राज्यम् | = राज्य (चाहता हूँ) |
१-जितने भी शकुन होते हैं, वे किसी अच्छी या बुरी घटनाके होनेमें निमित्त नहीं होते अर्थात् वे किसी घटनाके निर्माता नहीं होते, प्रत्युत भावी घटनाकी सूचना देनेवाले होते हैं।
शकुन बतानेवाले प्राणी भी वास्तवमें शकुनोंको बताते नहीं हैं; किन्तु उनकी स्वाभाविक चेष्टासे शकुन सूचित होते हैं।
२-यद्यपि अर्जुन शरीरमें होनेवाले लक्षणोंको भी शकुन मान रहे हैं, तथापि वास्तवमें ये शकुन नहीं हैं। ये तो शोकके कारण इन्द्रियाँ, शरीर, मन, बुद्धिमें होनेवाले विकार हैं।
३-यहाँ ‘पश्यामि’ क्रिया भूत और वर्तमानके शकुनोंके विषयमें और ‘अनुपश्यामि’ क्रिया भविष्यके परिणामके विषयमें आयी है।