भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

ही। द्युतक्रीडामें छल-कपट करके उन्होंने पाण्डवोंका धन और राज्य हर लिया था। द्रौपदीको भरी सभामें लाकर दुर्घोधनने 'मैंने तेरेको जीत लिया है, तू मेरी दासी हो गयी है' आदि शब्दोंसे बड़ा अपमान किया था और दुर्घोधनादिकी प्रेरणासे जयद्रथ द्रौपदीको हरकर ले गया था।

शास्त्रोंके वचनोंके अनुसार आततायीको मारनेसे मारनेवालेको कुछ भी दोष (पाप) नहीं लगता—'नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन' (मनुस्मृति ८।३५१)। परन्तु आततायीको मारना उचित होते हुए भी मारनेकी क्रिया अच्छी नहीं है। शास्त्र भी कहता है कि मनुष्यको कभी किसीकी हिंसा नहीं करनी चाहिये—'न हिंस्यात्सर्वं भूतानि'; हिंसा न करना परमधर्म है—'अहिंसा परमो धर्मः'।*। अतः

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें युद्धका दुष्परिणाम बताकर अब अर्जुन युद्ध करनेका सर्वथा अनौचित्य बताते हैं।

तस्मान्नाहर्षि वयं हन्तु धार्तराष्ट्रान्सवबान्धवान्।

स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥ ३७ ॥

तस्मात्= इसलियेवयम्= हमकुटुम्बियोंको
स्वबान्धवान्= अपने बान्धव (इन)न, अहर्षिः= योग्य नहीं हैं;हत्वा
धार्तराष्ट्रान्= धृतराष्ट्र-
सम्बन्धियोंकोहि= क्योंकिकथम्= कैसे
हन्तुम्= मारनेके लियेमाधव= हे माधव !सुखिनः
स्वजनम्= अपनेस्याम= होंगे ?

व्याख्या—'तस्मान्नाहर्षि वयं हन्तु धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान्'—अभीतक (पहले अध्यायके अट्टाईसवें श्लोकसे लेकर यहाँतक) मैंने कुटुम्बियोंको न मारनेमें जितनी युक्तियाँ, दलीलें दी हैं, जितने विचार प्रकट किये हैं, उनके रहते हुए हम ऐसे अनर्थकारी कार्यमें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं? अपने बान्धव इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको मारनेका कार्य हमारे लिये सर्वथा ही अयोग्य है, अनुचित है। हम-जैसे अच्छे पुरुष ऐसा अनुचित कार्य कर ही कैसे सकते हैं ?

'स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव'—

क्रोध-लोभके वशीभूत होकर कुटुम्बियोंकी हिंसाका कार्य हम क्यों करें ?

आततायी होनेसे ये दुर्घोधन आदि मारनेके लायक हैं ही; परन्तु अपने कुटुम्बी होनेसे इनको मारनेसे हमें पाप ही लगेगा; क्योंकि शास्त्रोंमें कहा गया है कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है—'स एव पापिष्ठतमो यः कुर्यात्कुलनाशनम्'। अतः जो आततायी अपने खास कुटुम्बी हैं, उन्हें कैसे मारा जाय ? उनसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लेना, उनसे अलग हो जाना तो ठीक है, पर उन्हें मारना ठीक नहीं है। जैसे, अपना बेटा ही आततायी हो जाय तो उससे अपना सम्बन्ध हटाया जा सकता है, पर उसे मारा थोड़े ही जा सकता है !

हे माधव ! इन कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे ही बड़ा दुःख हो रहा है, संताप हो रहा है, तो फिर क्रोध तथा लोभके वशीभूत होकर हम उनको मार दें तो कितना दुःख होगा ! उनको मारकर हम कैसे सुखी होंगे ?

यहाँ 'ये हमारे घनिष्ठ सम्बन्धी हैं'—इस ममताजनित मोहके कारण अपने क्षत्रियोचित कर्तव्यकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि ही नहीं जा रही है। कारण कि जहाँ मोह होता है, वहाँ मनुष्यका विवेक दब जाता है। विवेक दबनेसे मोहकी प्रबलता हो जाती है। मोहके प्रबल होनेसे अपने कर्तव्यका स्पष्ट भान नहीं होता।

  • आततायीको मार दे—यह अर्थशास्त्र है और किसीकी भी हिंसा न करे—यह धर्मशास्त्र है। जिसमें अपना कोई स्वार्थ (मतलब) रहता है, वह 'अर्थशास्त्र' कहलाता है; और जिसमें अपना कोई स्वार्थ नहीं रहता, वह 'धर्मशास्त्र' कहलाता है। अर्थशास्त्रकी अपेक्षा धर्मशास्त्र बलवान् होता है। अतः शास्त्रोंमें जहाँ अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र— दोनोंमें विरोध आये, वहाँ अर्थशास्त्रका त्याग करके धर्मशास्त्रको ही ग्रहण करना चाहिये—

स्मृत्योविरोधे न्यायस्तु बलवान्यवहारतः । अर्थशास्त्रान्तु बलवद्भर्मशास्त्रमिति स्थितिः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति २।२१)