भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ७ ]

रहता है और न भविष्य सदा रहता है, पर भगवान् सदा रहते हैं। जैसे भूतकाल और भविष्यकाल अभी नहीं हैं, ऐसे ही वर्तमानकाल भी नहीं है। भूतकाल और भविष्यकालकी सन्धिको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। पाणिनि-व्याकरणका एक सूत्र है—‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ (३।३।१३१) अर्थात् वर्तमानसामीप्य भी वर्तमानकी तरह होता है। जैसे, भूतकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी आया हूँ’ और भविष्यकालको लेकर कहते हैं कि ‘मैं अभी जा रहा हूँ’—यह वर्तमानसामीप्य है। वास्तवमें वर्तमानसामीप्यको ही वर्तमानकाल कह देते हैं। अगर वर्तमानकाल वास्तवमें होता तो वह कभी भूतकालमें परिणत नहीं होता। वास्तवमें काल वर्तमान नहीं है, प्रत्युत भगवान् ही वर्तमान हैं। तात्पर्य है कि जो प्रतिक्षण बदलता है, वह वर्तमान नहीं है, प्रत्युत जो कभी नहीं बदलता, वही वर्तमान है। इसलिये भगवान्ने श्लोकके आरम्भमें वर्तमान-क्रिया दी है—‘वेदाहम्’ (मैं जानता हूँ)। भगवान् भूत, भविष्य और वर्तमान—सबमें सदा वर्तमान हैं, पर भगवान्में न भूत है, न भविष्य है और न वर्तमान है। भगवान्का वर्तमानपना कालके अधीन नहीं है; क्योंकि भगवान् कालातीत हैं। काल न भगवान्की दृष्टिमें है, न महात्माकी दृष्टिमें।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह कहा कि मुझे कोई भी नहीं जानता, तो भगवान्को न जाननेमें मुख्य कारण क्या है? इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्रन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गं यान्ति परन्तप ॥ २७ ॥

कारण कि—

भारत= हे भरतवंशमें उत्पन्नद्रन्द्वमोहेन= द्वन्द्व-मोहसे (मोहित)सर्गं= संसारमें (अनादिकालसे)
परन्तप= शत्रुतापन अर्जुन!सम्मोहम्= सम्पूर्ण प्राणीयान्ति= प्राप्त हो रहे हैं।
इच्छा-द्वेषसमुत्थेन= इच्छा (राग) और

व्याख्या —‘इच्छाद्वेषसमुत्थेन ..... सर्गं यान्ति परन्तप’—इच्छा और द्वेषसे द्रन्द्वमोह पैदा होता है, जिससे मोहित होकर प्राणी भगवान्से बिलकुल विमुख हो जाते हैं और विमुख होनेसे बार-बार संसारमें जन्म लेते हैं।

मनुष्यको संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्में लगनेकी आवश्यकता है। भगवान्में न लगनेमें बड़ी बाधा क्या है? यह मनुष्यशरीर विवेक-प्रधान है; अतः मनुष्यकी प्रवृत्ति और निवृत्ति पशु-पक्षियोंकी तरह न होकर अपने विवेकके अनुसार होनी चाहिये। परन्तु मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व न देकर राग और द्वेषको लेकर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है, जिससे उसका पतन होता है।

मनुष्यकी दो मनोवृत्तियाँ हैं—एक तरफ लगाना और एक तरफसे हटाना। मनुष्यको परमात्मामें तो अपनी वृत्ति लगानी है और संसारसे अपनी वृत्ति हटानी है अर्थात् परमात्मासे तो प्रेम करना है और संसारसे वैराग्य करना है। परन्तु इन दोनों वृत्तियोंको जब मनुष्य केवल संसारमें ही लगा देता है, तब वही प्रेम और वैराग्य क्रमशः राग

और द्वेषका रूप धारण कर लेते हैं, जिससे मनुष्य संसारमें उलझ जाता है और भगवान्से सर्वथा विमुख हो जाता है। फिर भगवान्की तरफ चलनेका अवसर ही नहीं मिलता। कभी-कभी वह सत्संगकी बातें भी सुनता है, शास्त्र भी पढ़ता है, अच्छी बातोंपर विचार भी करता है, मनमें अच्छी बातें पैदा हो जाती हैं तो उनको ठीक भी समझता है। फिर भी उसके मनमें रागके कारण यह बात गहरी बैठी रहती है कि मुझे तो सांसारिक अनुकूलताको प्राप्त करना है और प्रतिकूलताको हटाना है, यह मेरा खास काम है; क्योंकि इसके बिना मेरा जीवन-निर्वाह नहीं होगा। इस प्रकार वह हृदयमें दृढ़तासे राग-द्वेषको पकड़े रखता है; जिससे सुनने, पढ़ने और विचार करनेपर भी उसकी वृत्ति राग-द्वेषरूप द्रन्द्वको नहीं छोड़ती। इसीसे वह परमात्माकी तरफ चल नहीं सकता।

द्रन्द्वोंमें भी अगर उसका राग मुख्यरूपसे एक ही विषयमें हो जाय, तो भी ठीक है। जैसे, भक्त बिल्बमंगलकी वृत्ति चिन्तामणि नामक वेश्यामें लग गयी,